तरुण कौशिक, संपादक सर्वव्यापी

छत्तीसगढ़ में स्वेच्छानुदान राशि को लेकर सरकार की कार्यप्रणाली अब सीधे-सीधे सवालों के घेरे में है। आरोप है कि मुख्यमंत्री विष्णु देव साय के नेतृत्व में चल रही व्यवस्था में जरूरतमंदों के लिए नियमों की दीवार खड़ी कर दी गई है, जबकि बाहरी संस्थाओं के लिए राहत के दरवाजे खुले हुए हैं। यह मामला अब केवल प्रशासनिक नहीं, बल्कि संवेदनहीनता और प्राथमिकताओं की राजनीति का प्रतीक बनता जा रहा है।प्रदेश के अलग-अलग हिस्सों से लगातार ऐसी शिकायतें सामने आ रही हैं कि गंभीर बीमारियों से जूझ रहे गरीब मरीज। जिनके पास इलाज के लिए कोई साधन नहीं, स्वेच्छानुदान राशि के लिए महीनों से भटक रहे हैं। इन मामलों में स्थानीय विधायक और मंत्रियों द्वारा विधिवत अनुशंसा की गई, लेकिन फाइलें या तो दबा दी गईं या फिर तकनीकी कारणों का हवाला देकर रोक दी गईं। इससे यह सवाल और गहरा हो गया है कि आखिर जनप्रतिनिधियों की सिफारिश भी अब बेअसर क्यों हो गई है।सबसे ज्यादा आक्रोश उस फैसले को लेकर है, जिसमें वरिष्ठ पत्रकारों द्वारा स्वेच्छानुदान राशि की मांग करने पर सीधे मदद देने के बजाय जिला कलेक्टरों को जांच प्रतिवेदन प्रस्तुत करने के आदेश जारी कर दिए गए। जिस योजना का उद्देश्य आपातकालीन राहत देना है, उसे कागजी जांच के बोझ तले दबा देना क्या पीड़ितों के साथ अन्याय नहीं है? यह सवाल अब खुलकर उठने लगा है।इसी बीच, पूरे विवाद को आग तब लगी जब यह तथ्य सामने आया कि छत्तीसगढ़ सरकार ने स्वेच्छानुदान मद से मध्यप्रदेश की एक संस्था को आर्थिक सहायता स्वीकृत कर दी। अब यही निर्णय सरकार की मंशा पर सबसे बड़ा सवाल बनकर खड़ा है। जब अपने राज्य के लोग इलाज के लिए दर-दर भटक रहे हैं, तब बाहरी संस्था को प्राथमिकता देना क्या दर्शाता है?विपक्ष ने इस पूरे मामले को “दोहरा मापदंड” बताते हुए सरकार पर सीधा हमला बोला है। उनका कहना है कि सरकार अपने ही नागरिकों के प्रति संवेदनहीन हो गई है और योजनाओं का लाभ जरूरतमंदों तक पहुंचाने में पूरी तरह विफल साबित हो रही है। सामाजिक संगठनों ने भी इस मुद्दे पर सरकार से जवाब मांगा है और स्वेच्छानुदान वितरण में पारदर्शिता लाने की मांग की है।विशेषज्ञों का मानना है कि यह मामला केवल एक-दो फाइलों का नहीं, बल्कि पूरी प्रणाली पर सवाल खड़ा करता है। अगर स्वेच्छानुदान जैसी योजना जो सीधे मानवीय संवेदना से जुड़ी है भी चयनात्मक तरीके से चलाई जाएगी, तो आम जनता का विश्वास डगमगाना तय है।अब नजरें मुख्यमंत्री विष्णु देव साय पर टिकी हैं। क्या वे इस पूरे मामले पर सफाई देंगे? क्या जरूरतमंदों को राहत देने के लिए प्रक्रिया को सरल बनाया जाएगा? या फिर यह मुद्दा आने वाले समय में सरकार के लिए बड़ा राजनीतिक संकट बन जाएगा?फिलहाल, छत्तीसगढ़ में एक ही सवाल गूंज रहा है, क्या स्वेच्छानुदान अब ‘जरूरत’ से नहीं, बल्कि ‘चयन’ से तय होगा?