तरुण कौशिक, संपादक सर्वव्यापी

बिलासपुर जिले के राजस्व न्यायालयों की कार्यप्रणाली एक बार फिर सवालों के घेरे में है। इस बार मामला न्यायालय अनुविभागीय अधिकारी (राजस्व) बिलासपुर से जुड़ा है, जहां एक प्रकरण में निर्धारित पेशी तिथि से पहले ही सुनवाई कर ली गई। सामने आई नोटशीट ने पूरे घटनाक्रम की परतें खोल दी हैं, जिससे प्रशासनिक पारदर्शिता और न्यायिक प्रक्रिया पर गंभीर सवाल खड़े हो रहे हैं।प्राप्त दस्तावेज के अनुसार, मामला नूतन भारद्वाज विरुद्ध अंकुर सिंह चाहिल से संबंधित है। यह प्रकरण राजस्व प्रकरण क्रमांक 121/2025-26 के अंतर्गत दर्ज है। नोटशीट में स्पष्ट रूप से उल्लेख है कि इस प्रकरण की अगली पेशी दिनांक 30 अप्रैल 2026 निर्धारित की गई थी। लेकिन चौंकाने वाली बात यह है कि उससे पहले ही 6 अप्रैल 2026 को मामले में सुनवाई की कार्रवाई कर दी गई।नोटशीट में दर्ज विवरण के मुताबिक, आवेदिका नूतन भारद्वाज की ओर से उनके अधिवक्ता ने न्यायालय में उपस्थित होकर आवेदन प्रस्तुत किया। यह आवेदन तहसीलदार बिलासपुर द्वारा पारित आदेश दिनांक 10 जून 2026 के संदर्भ में था, जिसमें छत्तीसगढ़ राजस्व संहिता 1959 की धारा 30 के अंतर्गत प्रकरण के स्थानांतरण की मांग की गई थी। अधिवक्ता ने अपने तर्क रखते हुए यह निवेदन किया कि मामले को अन्यत्र स्थानांतरित किया जाए।सबसे महत्वपूर्ण तथ्य यह है कि यह पूरी प्रक्रिया—प्रकरण प्रस्तुत करना, अधिवक्ता द्वारा तर्क देना और सुनवाई—उस समय की गई जब आधिकारिक रूप से अगली पेशी की तारीख अभी आई ही नहीं थी। यानी, 30 अप्रैल 2026 की तय तारीख से लगभग 24 दिन पहले ही 6 अप्रैल को कार्रवाई पूरी कर ली गई।नोटशीट में यह भी उल्लेख मिलता है कि अधिवक्ता द्वारा मौखिक तर्क प्रस्तुत किए गए और उसके आधार पर प्रकरण को आगे बढ़ाया गया। हालांकि, यह स्पष्ट नहीं है कि इस दौरान प्रतिपक्ष यानी अंकुर सिंह चाहिल को इस सुनवाई की जानकारी दी गई थी या नहीं। यदि नहीं, तो यह प्राकृतिक न्याय के सिद्धांतों का उल्लंघन माना जा सकता है, जिसमें दोनों पक्षों को समान अवसर मिलना आवश्यक होता है।प्रशासनिक और कानूनी विशेषज्ञों का मानना है कि किसी भी न्यायिक या अर्ध-न्यायिक प्रक्रिया में निर्धारित तिथि से पहले सुनवाई करना तभी संभव है, जब सभी पक्षों को विधिवत सूचना दी गई हो और वे सुनवाई के लिए सहमत हों। लेकिन इस मामले में नोटशीट से ऐसा कोई स्पष्ट संकेत नहीं मिलता कि सभी आवश्यक प्रक्रियाओं का पालन किया गया।इस घटनाक्रम ने कई गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं— क्या प्रतिपक्ष को सुनवाई की पूर्व सूचना दी गई थी?क्या निर्धारित पेशी तिथि से पहले सुनवाई करने के लिए सक्षम अनुमति ली गई थी?क्या यह कार्रवाई नियमों के अनुरूप थी या फिर प्रक्रिया में कहीं न कहीं लापरवाही या मनमानी हुई है?सूत्रों की मानें तो इस मामले को लेकर अब उच्चाधिकारियों तक शिकायत पहुंचने की संभावना है। यदि जांच होती है, तो संबंधित अधिकारियों की भूमिका और निर्णय प्रक्रिया की गहन समीक्षा की जा सकती है।वहीं, इस पूरे मामले ने आम जनता के बीच भी न्यायिक प्रक्रिया की पारदर्शिता को लेकर चिंता बढ़ा दी है। लोगों का कहना है कि यदि तय तारीखों का पालन नहीं होगा और बिना सूचना के सुनवाई होती रहेगी, तो आम नागरिकों का भरोसा व्यवस्था से उठ सकता है।फिलहाल, आवेदिका नूतन भारद्वाज के इस प्रकरण ने एक बड़ा प्रशासनिक मुद्दा खड़ा कर दिया है। अब देखना यह होगा कि जिम्मेदार अधिकारी इस पर क्या स्पष्टीकरण देते हैं और क्या इस मामले में किसी प्रकार की जांच या कार्रवाई होती है या नहीं।