तरुण कौशिक, संपादक सर्वव्यापी

बैंक ऋण, सरफेसी एक्ट के तहत कार्रवाई, संपत्ति नीलामी और राजस्व प्रशासन की कार्यप्रणाली को लेकर एक गंभीर विवाद सामने आया है, जिसमें तहसीलदार प्रकृति ध्रुव और एसडीएम मनीष साहू की भूमिका पर सीधे सवाल उठाए गए हैं। मंगला निवासी पीड़िता नूतन भारद्वाज ने पूरे मामले को लेकर पद के दुरुपयोग, एकपक्षीय कार्रवाई और नियमों की अनदेखी के आरोप लगाए हैं तथा उच्चस्तरीय जांच की मांग की है।प्राप्त जानकारी के अनुसार, नूतन भारद्वाज ने व्यापार विहार स्थित बैंक ऑफ इंडिया से भवन निर्माण के लिए ऋण लिया था। प्रारंभिक समय में ऋण की अदायगी नियमित रूप से की जा रही थी, लेकिन कोविड-19 काल में आर्थिक स्थिति कमजोर होने के कारण वे किस्तें जमा नहीं कर सकीं। इसके बाद बैंक द्वारा सरफेसी एक्ट के तहत कार्रवाई प्रारंभ की गई और जिला दंडाधिकारी, बिलासपुर के माध्यम से 10 जून 2024 को बेदखली का आदेश पारित कराया गया। इस आदेश के खिलाफ पीड़िता ने डेब्ट रिकवरी ट्रिब्यूनल (डीआरटी) जबलपुर में अपील दायर की है, जहां मामला वर्तमान में विचाराधीन है और अगली सुनवाई 30 अप्रैल 2026 को निर्धारित है।आरोप है कि न्यायालय में मामला लंबित होने के बावजूद प्रशासनिक स्तर पर जल्दबाजी दिखाते हुए अतिरिक्त तहसीलदार प्रकृति ध्रुव द्वारा माल जमादार को आदेशित कर भवन का कब्जा बैंक अधिकारियों को सौंपने की कार्रवाई कराई गई। पीड़िता का कहना है कि जिला दंडाधिकारी के अधिकार का दोहरा प्रत्यायोजन किया गया, जो विधि विरुद्ध है। 5 जनवरी 2026 को कथित रूप से अनुचित तरीके से कब्जा दिलाया गया और विरोध करने पर उन्हें डराया-धमकाया गया तथा जबरन घर से बेदखल कर दिया गया, जबकि मामला डीआरटी में विचाराधीन था।मामले में नीलामी प्रक्रिया को लेकर भी गंभीर अनियमितताओं के आरोप लगे हैं। बताया गया है कि जिला दंडाधिकारी के आदेश में खसरा नंबर 305/19 का उल्लेख है, जबकि बैंक द्वारा नीलामी प्रक्रिया में 305/07 अंकित किया गया और उसी आधार पर सेल सर्टिफिकेट जारी किया गया। बाद में खरीदार अंकुर चाहिल को दो अलग-अलग सेल सर्टिफिकेट जारी किए गए, जिनमें अलग-अलग खसरा नंबर दर्शाए गए हैं। पीड़िता का दावा है कि 305/07 खसरा किसी अन्य व्यक्ति के नाम दर्ज है, जबकि 305/19 उनकी स्वयं की संपत्ति है। इसके बावजूद 17 जनवरी 2026 को रजिस्ट्री कराई गई और नामांतरण की प्रक्रिया भी तेजी से आगे बढ़ाई गई।पीड़िता ने आरोप लगाया है कि नामांतरण की कार्यवाही के दौरान उनकी आपत्तियों को नजरअंदाज किया गया और अतिरिक्त तहसीलदार द्वारा असामान्य तत्परता दिखाई गई। उन्होंने यह भी कहा कि उनके वकील के समक्ष उन्हें जेल भेजने की धमकी दी गई। उनका कहना है कि जब मामला डीआरटी जबलपुर में लंबित है, तब हक और स्वत्व का अंतिम निर्धारण नहीं हुआ है, ऐसे में किसी तीसरे व्यक्ति के नाम नामांतरण करना न केवल विधि विरुद्ध है, बल्कि किसी विशेष व्यक्ति को लाभ पहुंचाने का प्रयास भी प्रतीत होता है।इस पूरे घटनाक्रम में अनुविभागीय अधिकारी राजस्व मनीष साहू की भूमिका पर भी सवाल उठाए गए हैं। पीड़िता का आरोप है कि राजस्व प्रशासन के उच्च स्तर पर निगरानी और निष्पक्षता सुनिश्चित नहीं की गई, जिसके चलते निचले स्तर पर कथित रूप से एकपक्षीय और पक्षपातपूर्ण निर्णय लिए गए।मामले को लेकर नूतन भारद्वाज ने मुख्यमंत्री विष्णु देव साय, प्रमुख सचिव सुबोध कुमार सिंह, राजस्व सचिव रीना बाबा सिंह कंगाले, संभाग आयुक्त सुनील जैन और कलेक्टर संजय अग्रवाल को ज्ञापन सौंपकर मामले की सूक्ष्म जांच कराने, दोषी अधिकारियों के खिलाफ अनुशासनात्मक कार्रवाई करने और पीड़ित परिवार को न्याय दिलाने की मांग की है।अब यह मामला प्रशासनिक और कानूनी दोनों ही स्तरों पर संवेदनशील बन चुका है। आरोपों की गंभीरता को देखते हुए यदि निष्पक्ष जांच होती है तो कई महत्वपूर्ण तथ्य सामने आ सकते हैं। फिलहाल, सबकी नजरें प्रशासन के अगले कदम पर टिकी हैं कि क्या इस पूरे प्रकरण में जिम्मेदार अधिकारियों की जवाबदेही तय होगी या मामला जांच के दायरे में ही सिमट कर रह जाएगा।