ढाई साल में भी खाली कुर्सियां: सलाहकारों की ‘सलाह’ पर सवाल, क्या सिर्फ वेतन लेने तक सीमित है व्यवस्था?

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तरुण कौशिक, संपादक सर्वव्यापी

छत्तीसगढ़ में भाजपा सरकार के करीब ढाई साल पूरे होने को हैं, लेकिन नगरीय निकायों से लेकर निगम, मंडल, आयोग और सहकारी संस्थाओं तक नियुक्तियों का संकट जस का तस बना हुआ है। हालात यह हैं कि प्रदेश के अधिकांश नगर निगम, नगर पालिका और नगर पंचायत क्षेत्रों में अब तक एल्डरमैन यानी मनोनीत पार्षदों की नियुक्ति तक नहीं हो पाई है। इससे स्थानीय प्रशासनिक और राजनीतिक संतुलन प्रभावित हो रहा है, वहीं जनप्रतिनिधित्व का एक महत्वपूर्ण हिस्सा अधूरा पड़ा है।सिर्फ नगरीय निकाय ही नहीं, बल्कि राज्य के कई अहम संस्थान—जैसे निगम, मंडल, आयोग, मंडी बोर्ड और जिला सहकारी केंद्रीय बैंक—भी आधे-अधूरे ढांचे पर चल रहे हैं। सरकार ने इनमें अध्यक्ष और उपाध्यक्ष की नियुक्ति कर औपचारिकता जरूर पूरी कर दी, लेकिन सदस्यों की नियुक्ति लंबित होने से ये संस्थाएं प्रभावी ढंग से काम नहीं कर पा रहीं। निर्णय लेने की प्रक्रिया सीमित हो गई है और कई मामलों में कामकाज ठप या धीमा पड़ गया है।राजनीतिक गलियारों में अब इस मुद्दे पर सवाल तेज होने लगे हैं। सबसे बड़ा प्रश्न मुख्यमंत्री विष्णु देव साय के राजनीतिक और विभागीय सलाहकारों की कार्यप्रणाली पर उठ रहा है। आरोप यह है कि सरकार के पास सलाहकारों की पूरी टीम होने के बावजूद नियुक्तियों जैसे बुनियादी और आवश्यक निर्णयों में इतनी देरी क्यों हो रही है। क्या यह सलाहकार तंत्र सिर्फ कागजों तक सीमित है, या फिर वास्तव में शासन को दिशा देने में विफल साबित हो रहा है?सूत्रों के मुताबिक, कई विभागों में फाइलें लंबे समय से लंबित हैं, लेकिन उन पर ठोस निर्णय नहीं हो पा रहा है। इससे न केवल प्रशासनिक कार्य प्रभावित हो रहे हैं, बल्कि कार्यकर्ताओं और स्थानीय नेताओं में भी असंतोष बढ़ता जा रहा है। भाजपा संगठन के भीतर भी यह चर्चा जोर पकड़ रही है कि यदि समय रहते नियुक्तियां नहीं हुईं, तो इसका सीधा असर आने वाले चुनावों में दिख सकता है।विशेषज्ञों का मानना है कि एल्डरमैन और विभिन्न बोर्डों में सदस्यों की नियुक्ति सिर्फ राजनीतिक संतुलन का मामला नहीं होता, बल्कि यह प्रशासनिक दक्षता से भी जुड़ा होता है। इन पदों पर नियुक्त लोग नीतिगत फैसलों में भागीदारी करते हैं और स्थानीय समस्याओं के समाधान में अहम भूमिका निभाते हैं। ऐसे में इन पदों का खाली रहना शासन की कार्यक्षमता पर सीधा सवाल खड़ा करता है।विपक्ष भी इस मुद्दे को लेकर सरकार पर हमलावर हो गया है। आरोप लगाया जा रहा है कि सरकार में समन्वय की कमी है और निर्णय लेने की क्षमता कमजोर पड़ गई है। वहीं, सत्ता पक्ष के कुछ नेताओं का भी मानना है कि सलाहकार तंत्र को अधिक सक्रिय और जवाबदेह बनाने की जरूरत है, ताकि ऐसे महत्वपूर्ण फैसले समय पर लिए जा सकें।अब सबसे बड़ा सवाल यही है कि क्या सरकार इस देरी को लेकर कोई ठोस कदम उठाएगी, या फिर नियुक्तियों का यह सिलसिला यूं ही लंबा खिंचता रहेगा। यदि स्थिति जल्द नहीं सुधरी, तो यह मुद्दा केवल प्रशासनिक विफलता तक सीमित नहीं रहेगा, बल्कि राजनीतिक नुकसान का कारण भी बन सकता है।


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