तरुण कौशिक, संपादक सर्वव्यापी

छत्तीसगढ़ में एक ओर मुख्यमंत्री विष्णु देव साय लगातार सुशासन, पारदर्शिता और त्वरित प्रशासनिक निर्णयों की बात कर रहे हैं, वहीं दूसरी ओर स्कूल शिक्षा विभाग की जमीनी कार्यप्रणाली पर गंभीर सवाल खड़े होते दिखाई दे रहे हैं।ताजा मामला जिला रायपुर के शिक्षा विभाग से जुड़ा हुआ है, जहां एक व्याख्याता के लघुकृत अवकाश स्वीकृति का प्रकरण लगभग डेढ़ वर्ष से लंबित बताया जा रहा है।प्राप्त जानकारी के अनुसार, कार्यालय जिला शिक्षा अधिकारी, रायपुर द्वारा 6 फरवरी 2025 को लोक शिक्षण संचालनालय, छत्तीसगढ़ को एक प्रस्ताव प्रेषित किया गया है। यह प्रस्ताव शासकीय उच्चतर माध्यमिक विद्यालय तुलसी (बाराडेरा), विकासखंड धरसींवा में पदस्थ व्याख्याता (एल.बी.) स्नेहा चौधरी के 15 फरवरी 2023 से 15 मई 2023 तक कुल 89 दिवस के लघुकृत अवकाश की स्वीकृति से संबंधित है।पत्र में स्पष्ट उल्लेख किया गया है कि संबंधित अवकाश शासन के वित्त एवं योजना विभाग के नियमों के अंतर्गत नियत सीमा से अधिक अवधि का है, जिसके कारण इसकी स्वीकृति का अधिकार लोक शिक्षण संचालनालय स्तर पर निहित है। साथ ही प्रारूप-03 एवं 04 तथा अवकाश संबंधी संपूर्ण दस्तावेज भी संलग्न कर प्रकरण आगे प्रेषित किया गया है।हालांकि प्रशासनिक प्रक्रिया के अनुसार यह प्रकरण शासन स्तर पर भेजा जा चुका है, लेकिन लगभग डेढ़ वर्ष बाद भी अंतिम निर्णय नहीं हो पाने से विभागीय कार्यशैली पर सवाल उठ रहे हैं।शिक्षा क्षेत्र से जुड़े जानकारों का कहना है कि जब एक साधारण सेवा संबंधित प्रकरण वर्षों तक लंबित रहता है, तो इससे न केवल प्रशासनिक दक्षता पर प्रश्न उठता है बल्कि कर्मचारियों के हित भी प्रभावित होते हैं।वहीं दूसरी ओर मुख्यमंत्री विष्णु देव साय द्वारा सुशासन और त्वरित निर्णय प्रणाली को प्राथमिकता दिए जाने के दावों के बीच इस प्रकार के लंबित प्रकरण सरकार के दावों और जमीनी हकीकत के बीच अंतर को भी उजागर करते हैं।अब देखना यह होगा कि लोक शिक्षण संचालनालय इस प्रकरण पर कब तक अंतिम निर्णय लेता है और क्या वास्तव में प्रशासनिक प्रक्रियाओं में अपेक्षित गति लाई जा सकेगी या नहीं।