संपादक के कलम से…भाखा के सम्मान म पीछे काबर छत्तीसगढ ?

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तरुण कौशिक, संपादक सर्वव्यापी

महाराष्ट्र सरकार ह जेन फैसला ले हे, वो सिरिफ प्रशासनिक आदेश नइ, बल्कि सांस्कृतिक आत्मसम्मान के एक ठोस उदाहरण आय। ऑटो-रिक्शा अऊ टैक्सी चालक मन बर मराठी भाखा के ज्ञान ला अनिवार्य करना, ये बताथे के उहां के सरकार अपन माटी अऊ भाखा के महत्व ला कितने गंभीरता ले लेथे। अब सवाल साफ हे—का छत्तीसगढ म अइसने सोच के कमी हे, या इच्छाशक्ति के?छत्तीसगढ एक नवां राज्य जरूर आय, फेर ओकर सांस्कृतिक जड़ बहुत गहिरा अऊ मजबूत हे। छत्तीसगढी भाखा सिरिफ बोलचाल के माध्यम नइ, बल्कि ये हमर लोकजीवन, परंपरा, गीत-संगीत अऊ संस्कार के आत्मा आय। फेर दुख के बात ये हे के आज घलो ये भाखा अपन ही घर म उपेक्षा झेलत हे।सरकार के मंच ले छत्तीसगढी के गुणगान तो खूब होथे, फेर जमीनी स्तर म ओकर उपयोग बढ़ाय बर कोनो ठोस नीति नजर नइ आवत। सरकारी दफ्तर मन म कामकाज आज घलो हिंदी अऊ अंग्रेजी म होवत हे, जिहां आम जनता बर छत्तीसगढी म संवाद सहज अऊ सरल हो सकत रहितिस। स्कूल मन म छत्तीसगढी पढ़ई के बात जरूर होथे, फेर वो ह घलो सीमित दायरा म बंधे हे।महाराष्ट्र जइसन राज्य ये साबित कर दिस के अगर सरकार चाह लेवय, त भाखा के संरक्षण अऊ संवर्धन बर सख्त निर्णय ले सकत हे। उहां ड्राइवर मन बर मराठी जानना जरूरी कर दे गे हे, जेन ले आम जनता ला सुविधा के संग-संग अपन भाखा के उपयोग म घलो बढ़ोतरी होही। ये कदम सिरिफ नियम नइ, बल्कि सामाजिक बदलाव के दिशा म एक मजबूत पहल आय।छत्तीसगढ म घलो अइसने पहल के जरूरत हे। अगर ऑटो-रिक्शा चालक, दुकानदार, सरकारी कर्मचारी मन ला छत्तीसगढी म संवाद करे बर प्रेरित या अनिवार्य करे जाही, त ये भाखा अपन आप मजबूत हो जाही। ये सिरिफ सरकार के जिम्मेदारी नइ, समाज के हर वर्ग ला अपन भूमिका निभाय के जरूरत हे।सबसे बड़ा सवाल ये हे के का हमन अपन भाखा म बात करे म गर्व महसूस करथन? या अब घलो हिंदी-अंग्रेजी ला ही प्रतिष्ठा के प्रतीक मानथन? जब तक ये मानसिकता नइ बदलही, तब तक कोनो कानून या आदेश घलो ज्यादा असरदार साबित नइ हो सकय।छत्तीसगढी के सम्मान बर जरूरी हे के सरकार एक स्पष्ट नीति बनावय—स्कूल शिक्षा म ओकर व्यापक समावेश होवय, सरकारी कामकाज म ओकर उपयोग बढ़ाय जावय, अऊ सार्वजनिक जीवन म ओकर प्रयोग ला बढ़ावा मिले। मीडिया अऊ सांस्कृतिक मंच मन घलो ए दिशा म महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकथें।आज जरूरत हे जागरूकता के, पहल के अऊ सबसे ज्यादा इच्छाशक्ति के। अगर हमन अभी घलो अपन भाखा बर खड़ा नइ होन, त धीरे-धीरे ये सिरिफ औपचारिकता बन के रह जाही। महाराष्ट्र ह रास्ता दिखा दिस हे, अब छत्तीसगढ ला अपन दिशा खुद तय करना हे।अंत म बस ए कहे जावत हे—भाखा सिरिफ शब्द नइ, ये पहचान आय। जेन दिन हमन ये बात ला समझ जाबो, ओ दिन छत्तीसगढी ला ओकर सही सम्मान जरूर मिलही।


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