नारे बनाम हकीकत: ‘गढ़बो नवा छत्तीसगढ़’ से ‘हम हीं संवारेंगे’ तक—जनता पूछ रही, आखिर सुधरेगा कब सिस्टम?

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तरुण कौशिक, संपादक सर्वव्यापी

छत्तीसगढ़ की राजनीति में पिछले कुछ वर्षों के दौरान बड़े-बड़े नारों और जनहितकारी अभियानों की भरमार रही है, लेकिन जमीनी हकीकत इन दावों से कितनी मेल खाती है, यह अब जनता के बीच एक बड़ा सवाल बनकर खड़ा हो गया है। तत्कालीन कांग्रेस सरकार ने बड़े उत्साह के साथ “गढ़बो नवा छत्तीसगढ़” का नारा दिया था, जिसका उद्देश्य राज्य को विकास और पारदर्शिता की नई ऊंचाइयों तक पहुंचाना बताया गया। लेकिन समय के साथ यह नारा सवालों के घेरे में आ गया, जब भ्रष्टाचार के आरोपों ने सरकार की छवि को गहरा आघात पहुंचाया।कांग्रेस शासनकाल में कई बड़े मामलों में आईएएस अधिकारियों से लेकर मंत्रियों तक के नाम सामने आए और कुछ मामलों में जेल तक की नौबत आई। इससे यह धारणा बनी कि जिस “नए छत्तीसगढ़” की बात की जा रही थी, वह कहीं न कहीं भ्रष्टाचार की परतों में उलझ गया। जनता के बीच यह संदेश गया कि नारे और घोषणाएं अपनी जगह हैं, लेकिन शासन व्यवस्था में पारदर्शिता और जवाबदेही की कमी बनी रही।वहीं दूसरी ओर, सत्ता परिवर्तन के बाद वर्तमान भाजपा सरकार ने “हमने बनाया है, हम हीं संवारेंगे” का नारा देते हुए नई उम्मीदें जगाईं। सरकार ने अपने कार्यकाल की शुरुआत में सुशासन और जवाबदेही पर जोर देने का दावा किया और इसी क्रम में “सुशासन तिहार” जैसे कार्यक्रमों की शुरुआत की गई। इस कार्यक्रम का उद्देश्य भी वही बताया गया जो पहले “भेंट-मुलाकात” कार्यक्रम का था—जनता की समस्याओं को सीधे सुनना और उनका त्वरित समाधान करना।लेकिन सवाल यह उठता है कि क्या इन कार्यक्रमों से वास्तव में जनता को राहत मिल रही है या यह भी केवल एक औपचारिकता बनकर रह गया है? जमीनी स्तर पर कई जगहों से यह आवाज उठ रही है कि समस्याएं सुनने की प्रक्रिया तो हो रही है, लेकिन समाधान की गति बेहद धीमी है। शिकायतें दर्ज हो रही हैं, लेकिन उनका निराकरण समय पर नहीं हो पा रहा, जिससे लोगों में असंतोष बढ़ रहा है।भाजपा के अपने कार्यकर्ताओं के बीच भी नाराजगी की खबरें सामने आ रही हैं। संगठन के भीतर यह चर्चा है कि कार्यकर्ताओं की अपेक्षाओं और सरकार की कार्यप्रणाली के बीच एक बड़ा अंतर है। कई कार्यकर्ता यह महसूस कर रहे हैं कि उनकी बातों को वह महत्व नहीं मिल रहा, जिसकी उन्हें उम्मीद थी। यही कारण है कि सरकार के प्रति असंतोष अब केवल आम जनता तक सीमित नहीं रहा, बल्कि पार्टी के अंदर भी इसकी गूंज सुनाई देने लगी है।राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि चाहे कांग्रेस की “भेंट-मुलाकात” हो या भाजपा का “सुशासन तिहार”, दोनों का मूल उद्देश्य जनता से जुड़ाव और समस्याओं का समाधान था। लेकिन जब इन कार्यक्रमों का प्रभाव जमीनी स्तर पर दिखाई नहीं देता, तो यह केवल एक “इवेंट” बनकर रह जाते हैं। जनता अब केवल सुनवाई नहीं, बल्कि परिणाम चाहती है।ग्रामीण क्षेत्रों में पेयजल, बिजली, सड़क और स्वास्थ्य जैसी बुनियादी समस्याएं अब भी बनी हुई हैं। शहरी इलाकों में भी अव्यवस्था और भ्रष्टाचार के आरोप कम नहीं हुए हैं। ऐसे में जनता के बीच यह सवाल स्वाभाविक है कि जब दोनों ही सरकारों के कार्यक्रमों का उद्देश्य एक ही था, तो आखिर बदलाव कहां दिख रहा है?विशेषज्ञों का कहना है कि किसी भी सरकार की सफलता केवल उसके नारों या कार्यक्रमों से नहीं, बल्कि उनके प्रभावी क्रियान्वयन से तय होती है। यदि योजनाएं केवल कागजों और मंचों तक सीमित रह जाएं, तो उनका कोई वास्तविक लाभ नहीं होता। यही स्थिति आज छत्तीसगढ़ में देखने को मिल रही है, जहां घोषणाएं और कार्यक्रम तो हैं, लेकिन परिणामों को लेकर संतोषजनक स्थिति नहीं बन पाई है।अब देखना यह होगा कि वर्तमान सरकार इस बढ़ते असंतोष को किस तरह संभालती है। क्या “सुशासन तिहार” वास्तव में सुशासन का उदाहरण बन पाएगा, या यह भी समय के साथ एक और औपचारिक कार्यक्रम बनकर रह जाएगा? जनता की नजरें अब केवल वादों पर नहीं, बल्कि ठोस काम और परिणामों पर टिकी हुई हैं।अंततः यह स्पष्ट है कि चाहे कोई भी सरकार हो, यदि जनता की उम्मीदों पर खरी नहीं उतरती, तो नारों की चमक ज्यादा दिनों तक नहीं टिकती। छत्तीसगढ़ की जनता अब जागरूक है और वह केवल सुनने नहीं, बल्कि बदलाव देखने के मूड में है। यही इस पूरे राजनीतिक परिदृश्य का सबसे बड़ा संदेश है।


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