तरुण कौशिक, संपादक सर्वव्यापी
छत्तीसगढ़ महानदी भवन मंत्रालय में लागू ई-ऑफिस प्रणाली ने जहां शासकीय कामकाज को ऑनलाइन और त्वरित बनाने का दावा किया है, वहीं इसके चलते वर्षों से सेवाएं दे रहे निजी स्टाफ कर्मचारियों के सामने अस्तित्व का संकट खड़ा हो गया है। मंत्रालय में पदस्थ लगभग 110 निजी स्टाफ कर्मचारी इन दिनों खुद को लगभग निष्क्रिय और उपेक्षित महसूस कर रहे हैं।निजी स्टाफ कर्मचारियों का कहना है कि ऑफलाइन व्यवस्था के दौरान विभागीय फाइलें उनके माध्यम से गुजरकर ही आईएएस अधिकारियों तक पहुंचती थीं। इस प्रक्रिया में उनकी वर्षों की प्रशासनिक समझ, अनुभव और दस्तावेजों की बारीकी से जांच की भूमिका बेहद महत्वपूर्ण होती थी। लेकिन ई-ऑफिस प्रणाली लागू होने के बाद यह पूरी प्रक्रिया डिजिटल हो गई है, जिससे इन अनुभवी कर्मचारियों की भूमिका लगभग समाप्त हो गई है।कर्मचारियों का आरोप है कि कुछ विभागीय सचिवों द्वारा बाहरी व्यक्तियों को संविदा पर नियुक्त कर निजी स्टाफ का कार्य उनसे करवाया जा रहा है, जबकि नियमित कर्मचारी खाली बैठे हैं। इससे न केवल विभागीय व्यवस्था पर सवाल उठ रहे हैं, बल्कि लंबे समय से कार्यरत कर्मचारियों के आत्मसम्मान और भविष्य पर भी असर पड़ रहा है।मंत्रालय में कार्यरत कर्मचारियों ने यह भी चिंता जताई है कि पूरी तरह डिजिटल व्यवस्था में पारदर्शिता के दावे के बावजूद फर्जीवाड़े की संभावनाएं बढ़ी हैं। हाल ही में सामान्य प्रशासन विभाग के सचिव के डिजिटल हस्ताक्षर से कथित रूप से नियुक्ति पत्र जारी होने के मामले में एफआईआर दर्ज होने की घटना ने इस आशंका को और मजबूत किया है। कर्मचारियों का कहना है कि यदि अनुभवी स्टाफ की पारंपरिक जांच-परख प्रक्रिया बनी रहती, तो इस तरह की अनियमितताओं को रोका जा सकता था।निजी स्टाफ कर्मचारियों ने राज्य सरकार से मांग की है कि ई-ऑफिस प्रणाली के साथ-साथ उनके अनुभव और विशेषज्ञता का भी समुचित उपयोग सुनिश्चित किया जाए। उनका कहना है कि डिजिटल और मानवीय संसाधनों के संतुलन से ही प्रशासनिक कार्यों में पारदर्शिता और विश्वसनीयता लाई जा सकती है।कर्मचारियों ने चेतावनी दी है कि यदि उनकी भूमिका को पुनर्स्थापित नहीं किया गया और बाहरी संविदा नियुक्तियों पर रोक नहीं लगी, तो वे अपने अधिकारों की रक्षा के लिए आंदोलन का रास्ता भी अपना सकते हैं।