तरुण कौशिक, संपादक सर्वव्यापी
छत्तीसगढ़ में विष्णु देव साय सरकार इन दिनों जिस तरह सोशल मीडिया में लगातार घिरती नजर आ रही है, उसने सत्ता और संगठन दोनों के भीतर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। मुख्यमंत्री से लेकर कई मंत्रियों तक को लेकर वायरल हो रहे वीडियो, पोस्ट, आरोप और राजनीतिक टिप्पणियां अब केवल विपक्षी हमला नहीं माने जा रहे, बल्कि सत्ता के भीतर बैठे सलाहकारों, मीडिया प्रभारियों और अफसरशाही की कमजोर रणनीति का परिणाम भी समझे जा रहे हैं। राजनीतिक जानकारों का मानना है कि सरकार की सबसे बड़ी परेशानी विपक्ष नहीं, बल्कि उसकी अपनी सुस्त और असंगठित छवि प्रबंधन व्यवस्था बन चुकी है।प्रदेश में सरकार बनने के बाद जनता के बीच बड़े फैसलों, योजनाओं और प्रशासनिक बदलावों को लेकर सकारात्मक माहौल बनाने की जिम्मेदारी जिन लोगों पर थी, वही तंत्र अब सवालों के घेरे में दिखाई दे रहा है। मुख्यमंत्री कार्यालय से लेकर मंत्रियों के निजी मीडिया सेल तक, अधिकांश व्यवस्था केवल औपचारिक प्रेस विज्ञप्तियों और फोटो जारी करने तक सीमित नजर आती है। डिजिटल राजनीति के इस दौर में जहां हर मिनट नैरेटिव बदल रहा है, वहां सरकार का जवाबी तंत्र बेहद धीमा और कमजोर दिखाई देता है। यही कारण है कि सोशल मीडिया में सरकार का पक्ष मजबूत तरीके से सामने आने से पहले ही नकारात्मक धारणा तेजी से फैल जाती है।राजनीतिक विश्लेषकों का कहना है कि वर्तमान दौर केवल प्रशासन चलाने का नहीं बल्कि धारणा निर्माण का दौर है। यदि सरकार अपनी उपलब्धियों को प्रभावी तरीके से जनता तक नहीं पहुंचा पा रही, तो उसका सीधा राजनीतिक नुकसान होना तय है। कई मामलों में देखा गया है कि मंत्रियों से जुड़े विवाद या आरोप सोशल मीडिया में घंटों और दिनों तक चलते रहते हैं, लेकिन सरकार की ओर से कोई स्पष्ट, तथ्यात्मक और प्रभावी प्रतिक्रिया सामने नहीं आती। इससे आम जनता के बीच भ्रम और अविश्वास की स्थिति बनती है।सरकार के भीतर यह चर्चा भी तेज हो रही है कि कुछ सलाहकार और मीडिया प्रभारी केवल पद और प्रभाव तक सीमित हो चुके हैं, जबकि जमीनी राजनीतिक समझ और डिजिटल रणनीति में वे पूरी तरह कमजोर साबित हो रहे हैं। मुख्यमंत्री की छवि को मजबूत करने के बजाय कई बार उनके आसपास का तंत्र ही भ्रम और दूरी पैदा करता दिखाई देता है। यही वजह है कि सरकार की उपलब्धियों से ज्यादा सोशल मीडिया में विवाद और आलोचनाएं चर्चा का विषय बन रही हैं।विष्णु देव साय की व्यक्तिगत छवि अब तक एक सरल, शांत और संतुलित नेता की रही है, लेकिन लगातार फैलते नकारात्मक नैरेटिव का असर उनकी राजनीतिक साख पर भी पड़ता दिखाई दे रहा है। राजनीतिक पर्यवेक्षकों का मानना है कि यदि समय रहते सरकार ने अपने मीडिया प्रबंधन, सलाहकार तंत्र और डिजिटल प्रतिक्रिया प्रणाली में बदलाव नहीं किया, तो आने वाले समय में यह संकट और गहरा सकता है।सरकार के सामने अब सबसे बड़ी चुनौती केवल योजनाएं बनाना नहीं, बल्कि जनता तक उनका भरोसेमंद और प्रभावी संदेश पहुंचाना है। क्योंकि आज की राजनीति में काम जितना महत्वपूर्ण है, उससे कहीं ज्यादा महत्वपूर्ण उसकी प्रस्तुति और जनता के बीच बनने वाली धारणा हो चुकी है।