तरुण कौशिक, संपादक सर्वव्यापी
छत्तीसगढ़ के परिवहन विभाग में लंबे समय से जमे भ्रष्टाचार, फर्जीवाड़े और अनियमितताओं को लेकर एक बार फिर सवाल उठने लगे हैं। इसकी सबसे बड़ी वजह यह मानी जा रही है कि विभाग के वर्तमान सचिव एस. प्रकाश लगभग साढ़े चार वर्षों से एक ही विभाग में पदस्थ हैं, लेकिन इतने लंबे कार्यकाल के बावजूद विभागीय व्यवस्था में अपेक्षित सुधार दिखाई नहीं दे रहा है। राजनीतिक और प्रशासनिक गलियारों में चर्चा है कि यह छत्तीसगढ़ के प्रशासनिक इतिहास के उन चुनिंदा मामलों में से एक है, जहां कोई आईएएस अधिकारी इतने लंबे समय तक लगातार एक ही विभाग के सचिव पद पर बना रहा।परिवहन विभाग हमेशा से राजस्व और विवादों दोनों का केंद्र रहा है। फिटनेस प्रमाणपत्र, परमिट, टैक्स वसूली, अवैध बस संचालन, दलाली प्रथा, चेकपोस्ट अनियमितता और वाहन पंजीयन से जुड़े मामलों में समय-समय पर शिकायतें सामने आती रही हैं। इसके बावजूद विभागीय स्तर पर बड़े नेटवर्क या जिम्मेदार अधिकारियों पर निर्णायक कार्रवाई नहीं हो सकी। यही कारण है कि अब सवाल केवल विभागीय भ्रष्टाचार पर नहीं, बल्कि प्रशासनिक इच्छाशक्ति पर भी उठ रहे हैं।विभाग के भीतर और बाहर यह चर्चा आम है कि इतने लंबे समय तक किसी अधिकारी का एक ही विभाग में बने रहना प्रशासनिक पारदर्शिता और जवाबदेही की दृष्टि से भी बहस का विषय होना चाहिए। आलोचकों का मानना है कि लंबे समय तक एक ही व्यवस्था में रहने से विभागीय नेटवर्क मजबूत हो जाते हैं और फिर सुधारात्मक कार्रवाई कमजोर पड़ने लगती है। दूसरी ओर समर्थकों का तर्क है कि निरंतरता से योजनाओं को स्थायित्व मिलता है, लेकिन परिवहन विभाग की जमीनी स्थिति इस दावे को मजबूत नहीं करती दिखाई देती।प्रदेश में समय-समय पर परिवहन विभाग से जुड़े कई विवाद सामने आए, जिनमें फर्जी दस्तावेजों के आधार पर वाहन संचालन, टैक्स चोरी, नियम विरुद्ध परमिट और कथित सांठगांठ जैसे मुद्दे प्रमुख रहे। विपक्षी दलों के साथ-साथ आम लोगों के बीच भी यह धारणा बन रही है कि विभागीय कार्रवाई केवल छोटे कर्मचारियों तक सीमित रह जाती है, जबकि बड़े स्तर पर जवाबदेही तय नहीं हो पाती।अब सबसे बड़ा सवाल यही है कि यदि साढ़े चार वर्षों का लंबा कार्यकाल भी विभागीय भ्रष्टाचार और फर्जीवाड़े पर प्रभावी नियंत्रण स्थापित नहीं कर सका, तो आखिर जिम्मेदारी किसकी तय होगी? सरकार सुशासन और पारदर्शिता की बात करती है, लेकिन परिवहन विभाग की स्थिति उन दावों की गंभीर परीक्षा ले रही है। जनता अब केवल बैठकों और समीक्षा रिपोर्टों से आगे बढ़कर ठोस कार्रवाई देखना चाहती है।