तरुण कौशिक, संपादक सर्वव्यापी
जलवायु संकट केवल वैज्ञानिकों की चेतावनी नहीं, यह धरती की वह पीड़ा है जो अब हर मौसम में, हर नदी के किनारे, हर सूखे खेत में और हर उजड़े जंगल में स्पष्ट रूप से दिखाई देती है । प्रकृति न बहस करती है, न समझौता — वह केवल संकेत देती है । उठती समुद्री लहरें, दहकते जंगल और पिघलते ग्लेशियर इन्हीं संकेतों की भाषा हैं, जिन्हें मानव समाज ने दशकों तक अनसुना किया और जिसकी कीमत आज पूरी दुनिया चुका रही है । अब यह चुनाव नहीं, विवशता है कि हम सुनें ।इस वर्ष विश्व पर्यावरण दिवस की थीम “प्रकृति से प्रेरित, जलवायु के लिए, हमारे भविष्य के लिए” के साथ अजरबैजान की राजधानी बाकू में मनाया जा रहा । यह आयोजन महज एक वार्षिक औपचारिकता नहीं — यह हमारे सामूहिक अस्तित्व की रक्षा का संकल्प-दिवस है । बाकू की मेजबानी स्वयं में एक संदेश है । यही वह देश है जिसने 2024 में cop29 की मेजबानी करते हुए जलवायु वित्त और कार्बन बाजार पर महत्वपूर्ण निर्णय लिए और जिसने 2035 तक उत्सर्जन में 40 प्रतिशत कटौती का संकल्प लिया है । यह इस बात का प्रमाण है कि आर्थिक विकास और पर्यावरण संरक्षण के बीच संतुलन असंभव नहीं — बस दृढ़ इच्छाशक्ति का विषय है ।संकट की गहराई को समझना आवश्यक है । वैज्ञानिकों ने स्पष्ट किया था कि वैश्विक तापमान को 1.5 डिग्री सेल्सियस की सीमा से नीचे रखना अनिवार्य है, किंतु आज हम उस सीमा को लाँघने की कगार पर हैं । जब पारा 50 डिग्री सेल्सियस को छूता है तो यह मौसमी विचलन नहीं बल्कि एक सभ्यता के सामने खड़ी चुनौती है । समुद्र का जलस्तर निरंतर ऊपर उठ रहा है, जंगलों में भीषण अग्निकांड सामान्य घटना बनते जा रहे हैं और बाढ़ तथा सूखे का एकांतर क्रम अब किसी रिपोर्ट में नहीं, खेतों और गलियों में दिखता है । संयुक्त राष्ट्र पर्यावरण कार्यक्रम का संदेश एकदम स्पष्ट है — देरी की अब कोई गुंजाइश नहीं । इसीलिए इस वर्ष का अभियान है #nowforclimate ।भारत के लिए यह थीम विशेष रूप से प्रासंगिक है । ओडिशा, महाराष्ट्र और उत्तर प्रदेश सहित देश के अनेक राज्यों में पिछले पाँच वर्षों में औसत तापमान में उल्लेखनीय वृद्धि दर्ज की गई है । अनियमित मानसून, असमय बाढ़ और लंबे सूखे के दौर — ये सब जलवायु परिवर्तन के प्रत्यक्ष लक्षण हैं । किंतु इसी अंधकार में प्रकृति स्वयं रोशनी की राह दिखाती है । वृक्षारोपण से लेकर मैंग्रोव वनों के संरक्षण तक, नदियों के पुनरुद्धार से लेकर कार्बन-तटस्थ कृषि पद्धतियों तक — प्रकृति-आधारित समाधान आज वैश्विक जलवायु विज्ञान के केंद्र में हैं और इनकी जड़ें भारत की सदियों पुरानी परंपराओं में भी गहरी हैं ।सरकारी स्तर पर स्वच्छ ऊर्जा, जल संचयन, इलेक्ट्रिक वाहन और वृक्षारोपण जैसे प्रयास स्वागतयोग्य हैं, किंतु नीतियों के साथ-साथ नागरिक चेतना भी उतनी ही अनिवार्य है । जल और बिजली की बचत, प्लास्टिक का त्याग और पर्यावरण-अनुकूल जीवनशैली — ये छोटे-छोटे कदम मिलकर एक बड़े बदलाव की नींव बनते हैं । परिवर्तन की शुरुआत हमेशा व्यक्ति से होती है और व्यक्ति का जागरण ही समाज का जागरण है ।विश्व पर्यावरण दिवस 2026 हमें यह स्मरण कराता है कि प्रकृति की रक्षा परोपकार नहीं, आत्म-संरक्षण है । आने वाली पीढ़ियों को एक स्वस्थ और साँस लेने योग्य ग्रह सौंपना हमारा सबसे बड़ा दायित्व है । इसलिए इस दिवस पर संकल्प लेना होगा कि हम ‘जागरूकता’ की भाषा से आगे बढ़कर ‘कार्रवाई’ की भाषा बोलें । प्रकृति हमारी प्रतीक्षा नहीं करेगी — अब हमें ही उसकी ओर कदम बढ़ाने होंगे और वह कदम आज, इसी क्षण उठाना होगा ।//लेखक//- *राणाप्रताप राय* विद्यार्थी, परास्नातक हिंदी साहित्य (चतुर्थ छमाही)महात्मा गांधी अंतरराष्ट्रीय हिंदी विश्वविद्यालय, वर्धा (महाराष्ट्र)जलवायु संकट केवल वैज्ञानिकों की चेतावनी नहीं, यह धरती की वह पीड़ा है जो अब हर मौसम में, हर नदी के किनारे, हर सूखे खेत में और हर उजड़े जंगल में स्पष्ट रूप से दिखाई देती है । प्रकृति न बहस करती है, न समझौता — वह केवल संकेत देती है । उठती समुद्री लहरें, दहकते जंगल और पिघलते ग्लेशियर इन्हीं संकेतों की भाषा हैं, जिन्हें मानव समाज ने दशकों तक अनसुना किया और जिसकी कीमत आज पूरी दुनिया चुका रही है । अब यह चुनाव नहीं, विवशता है कि हम सुनें ।इस वर्ष विश्व पर्यावरण दिवस की थीम “प्रकृति से प्रेरित, जलवायु के लिए, हमारे भविष्य के लिए” के साथ अजरबैजान की राजधानी बाकू में मनाया जा रहा । यह आयोजन महज एक वार्षिक औपचारिकता नहीं — यह हमारे सामूहिक अस्तित्व की रक्षा का संकल्प-दिवस है । बाकू की मेजबानी स्वयं में एक संदेश है । यही वह देश है जिसने 2024 में COP29 की मेजबानी करते हुए जलवायु वित्त और कार्बन बाजार पर महत्वपूर्ण निर्णय लिए और जिसने 2035 तक उत्सर्जन में 40 प्रतिशत कटौती का संकल्प लिया है । यह इस बात का प्रमाण है कि आर्थिक विकास और पर्यावरण संरक्षण के बीच संतुलन असंभव नहीं — बस दृढ़ इच्छाशक्ति का विषय है ।संकट की गहराई को समझना आवश्यक है । वैज्ञानिकों ने स्पष्ट किया था कि वैश्विक तापमान को 1.5 डिग्री सेल्सियस की सीमा से नीचे रखना अनिवार्य है, किंतु आज हम उस सीमा को लाँघने की कगार पर हैं । जब पारा 50 डिग्री सेल्सियस को छूता है तो यह मौसमी विचलन नहीं बल्कि एक सभ्यता के सामने खड़ी चुनौती है । समुद्र का जलस्तर निरंतर ऊपर उठ रहा है, जंगलों में भीषण अग्निकांड सामान्य घटना बनते जा रहे हैं और बाढ़ तथा सूखे का एकांतर क्रम अब किसी रिपोर्ट में नहीं, खेतों और गलियों में दिखता है । संयुक्त राष्ट्र पर्यावरण कार्यक्रम का संदेश एकदम स्पष्ट है — देरी की अब कोई गुंजाइश नहीं । इसीलिए इस वर्ष का अभियान है #NowForClimate ।भारत के लिए यह थीम विशेष रूप से प्रासंगिक है । ओडिशा, महाराष्ट्र और उत्तर प्रदेश सहित देश के अनेक राज्यों में पिछले पाँच वर्षों में औसत तापमान में उल्लेखनीय वृद्धि दर्ज की गई है । अनियमित मानसून, असमय बाढ़ और लंबे सूखे के दौर — ये सब जलवायु परिवर्तन के प्रत्यक्ष लक्षण हैं । किंतु इसी अंधकार में प्रकृति स्वयं रोशनी की राह दिखाती है । वृक्षारोपण से लेकर मैंग्रोव वनों के संरक्षण तक, नदियों के पुनरुद्धार से लेकर कार्बन-तटस्थ कृषि पद्धतियों तक — प्रकृति-आधारित समाधान आज वैश्विक जलवायु विज्ञान के केंद्र में हैं और इनकी जड़ें भारत की सदियों पुरानी परंपराओं में भी गहरी हैं ।सरकारी स्तर पर स्वच्छ ऊर्जा, जल संचयन, इलेक्ट्रिक वाहन और वृक्षारोपण जैसे प्रयास स्वागतयोग्य हैं, किंतु नीतियों के साथ-साथ नागरिक चेतना भी उतनी ही अनिवार्य है । जल और बिजली की बचत, प्लास्टिक का त्याग और पर्यावरण-अनुकूल जीवनशैली — ये छोटे-छोटे कदम मिलकर एक बड़े बदलाव की नींव बनते हैं । परिवर्तन की शुरुआत हमेशा व्यक्ति से होती है और व्यक्ति का जागरण ही समाज का जागरण है ।विश्व पर्यावरण दिवस 2026 हमें यह स्मरण कराता है कि प्रकृति की रक्षा परोपकार नहीं, आत्म-संरक्षण है । आने वाली पीढ़ियों को एक स्वस्थ और साँस लेने योग्य ग्रह सौंपना हमारा सबसे बड़ा दायित्व है । इसलिए इस दिवस पर संकल्प लेना होगा कि हम ‘जागरूकता’ की भाषा से आगे बढ़कर ‘कार्रवाई’ की भाषा बोलें । प्रकृति हमारी प्रतीक्षा नहीं करेगी — अब हमें ही उसकी ओर कदम बढ़ाने होंगे और वह कदम आज, इसी क्षण उठाना होगा ।//लेखक//- *राणाप्रताप राय* विद्यार्थी, परास्नातक हिंदी साहित्य (चतुर्थ छमाही)महात्मा गांधी अंतरराष्ट्रीय हिंदी विश्वविद्यालय, वर्धा (महाराष्ट्र)