वैधता की आड़ में फल-फूल रहा अवैध कोयला कारोबार? प्रशासनिक निगरानी और जवाबदेही पर उठ रहे सवाल।

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तरुण कौशिक, संपादक सर्वव्यापी

छत्तीसगढ़ के कोयला उत्पादक क्षेत्रों में इन दिनों वैध और अवैध कारोबार के बीच की रेखा को लेकर गंभीर सवाल उठने लगे हैं। खनन और परिवहन से जुड़े जानकारों का मानना है कि कुछ क्षेत्रों में वैध दस्तावेजों और अनुमति पत्रों की आड़ लेकर अवैध कोयले के कारोबार को संरक्षण मिलने की आशंका लगातार व्यक्त की जा रही है। यही कारण है कि समय-समय पर प्रशासनिक कार्रवाई के बावजूद अवैध कोयले का नेटवर्क पूरी तरह समाप्त नहीं हो पा रहा है।प्रदेश के कई जिलों में कोयला खदानों, डिपो और परिवहन मार्गों पर निगरानी के दावे किए जाते हैं, लेकिन जमीनी स्तर पर स्थिति कुछ और ही दिखाई देती है। स्थानीय लोगों का आरोप है कि कई बार वैध परिवहन चालान और अनुमति पत्रों का उपयोग कर निर्धारित मात्रा से अधिक कोयले का परिवहन किया जाता है। वहीं कुछ मामलों में वैध खदानों के आसपास से निकाले गए कोयले को भी वैध स्टॉक में मिलाने की शिकायतें सामने आती रही हैं।विशेषज्ञों के अनुसार कोयला कारोबार में सबसे बड़ी चुनौती पारदर्शिता और ट्रैकिंग व्यवस्था की है। यदि खदान से लेकर अंतिम उपभोक्ता तक प्रत्येक वाहन और प्रत्येक टन कोयले की डिजिटल निगरानी प्रभावी ढंग से हो, तो अवैध कारोबार की संभावनाएं काफी हद तक समाप्त हो सकती हैं। लेकिन जहां निगरानी कमजोर पड़ती है, वहां अवैध कारोबारी वैधता का आवरण ओढ़कर अपने नेटवर्क को संचालित करने में सफल हो जाते हैं।जानकारों का कहना है कि अवैध कोयला कारोबार केवल राजस्व की हानि का विषय नहीं है, बल्कि यह शासन-प्रशासन की विश्वसनीयता से भी जुड़ा हुआ मामला है। जब आम नागरिक यह देखते हैं कि छोटी-छोटी त्रुटियों पर कार्रवाई हो जाती है, लेकिन बड़े पैमाने पर चल रहे कथित अवैध कारोबार पर प्रभावी अंकुश नहीं लग पाता, तब व्यवस्था पर सवाल खड़े होना स्वाभाविक है।विपक्षी दल और सामाजिक संगठन भी समय-समय पर यह आरोप लगाते रहे हैं कि अवैध कोयला कारोबार बिना किसी स्थानीय संरक्षण या मिलीभगत के लंबे समय तक संचालित नहीं हो सकता। हालांकि प्रशासन ऐसे आरोपों को निराधार बताते हुए लगातार कार्रवाई का दावा करता रहा है। इसके बावजूद अवैध खनन, परिवहन और भंडारण से जुड़े मामलों का सामने आना इस बात का संकेत माना जा रहा है कि व्यवस्था में कहीं न कहीं खामियां अभी भी मौजूद हैं।आर्थिक विशेषज्ञों का मानना है कि यदि अवैध कारोबार पर प्रभावी नियंत्रण स्थापित हो जाए तो राज्य को करोड़ों रुपये का अतिरिक्त राजस्व प्राप्त हो सकता है, जिसका उपयोग शिक्षा, स्वास्थ्य, सड़क और ग्रामीण विकास जैसे क्षेत्रों में किया जा सकता है। इसलिए आवश्यकता केवल छापेमारी तक सीमित नहीं है, बल्कि जवाबदेही तय करने और पूरी आपूर्ति श्रृंखला को पारदर्शी बनाने की भी है।सवाल यह है कि क्या वैधता की आड़ में चल रहे कथित अवैध कोयला कारोबार पर सरकार और प्रशासन निर्णायक कार्रवाई कर पाएंगे, या फिर यह मुद्दा केवल समय-समय पर उठने वाली चर्चाओं तक ही सीमित रह जाएगा?


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