वर्धा जिले में देसी आम के पेडों को वापस लाने का प्रायोगिक अभिनव प्रयोग शुरू।

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तरुण कौशिक, संपादक सर्वव्यापी

अरण्यऋषि पद्मश्री मारुति चितमपल्ली के सहकारी कौशल मिश्र, महात्मा गांधी अंतरराष्ट्रीय हिंदी विश्वविद्यालय वर्धा महाराष्ट्र के जनसंपर्क अधिकारी बी. एस. मिरगे एवं एड. ताम्रध्वज बोरकर ने पिछले वर्ष से जो कार्य शुरू किया था, वह इस वर्षरूप लेने लगा है। कौशल मिश्र का कहना है की जिले में बड़ी संख्या में देसी आम के पेड़ पाए जाते थे और की गांवों में बड़ी मात्रा में अमराई हुआ करती थी। परंतु संतरा पैकिंग के लकड़े के लिए अमराई में मौजूद देसी आम के पेड़ कट गए। जिला आम के पेड़ो से खाली हो गया। इस कारण देसी आम के फलों का पाहुनचार इतिहास की बात हो गई।इस इतिहास को पुनः वापस लाने का प्रयास किया जा रहा है। इस पुनीत कार्य में वन विभाग के कई अधिकारियों की हृदय से सहायता मिलती है। जिले के उपवन संरक्षक हरवीर सिंह के समक्ष बचे हुए देसी आम की गुठलियों को जमा कर उससे ने पेड़ विकसित करने का प्रस्ताव रखा गया। इस प्रस्ताव को उन्होंने सहर्ष स्वीकार किया।‌ सहायक वन संरक्षक एम. आडे ने इस कार्य में हर संभव सहायता करने का वादा किया। कारंजा के पूर्व रेंजर नरेंद्र सावंत ने आम की गुठलियों को एकत्रित करने में अतुलनीय मदद की।‌ कारंजा परिक्षेत्र के वन रक्षक अक्षय जाधव ने बड़ी मेहनत से गांव-गांव की कैरी इकठ्ठा कर उसे कौशल मिश्र को सौंप दी।‌ पांजरा बंगला रेंज तलेगांव के शिवाजी सावंत ने भी कार्य को गति देने में मदद की। जमा किए गए गुठलियों के पैकेट पांजरा बंगला गांव में अक्षय जाधव द्वारा कौशल मिश्र को सौंपे गए। इस दौरान एम. आडे, वाघ, निलीमा मुणोत, सरपंच शेषराव आडे आदि की उपस्थिति रही। अब बरसात का मौसम शुरू होते ही सामाजिक वनीकरण विभाग की नर्सरी में इन गुठलियों को रोपित किया जाएगा। और पौधे बड़े होने पर इसे जगह-जगह लगाया जाएगा।‌ इन कार्यों में सामाजिक वनीकरण के वन रक्षक शिवाजी सावंत, विजय आदि की मदद मिली है।‌ कौशल मिश्र ने विश्वास जताया कि इस कार्य से देसी आम के पेड़ों को बचाए रखने का अरण्यऋषि मारुति चितमपल्ली का सपना पूरा होगा और वर्धा जिले में हर वन क्षेत्र में देसी आम की अमराई देखने को मिलेगी।‌


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