तरुण कौशिक, संपादक सर्वव्यापी
छत्तीसगढ़ के स्कूल शिक्षा विभाग में चल रही स्थानांतरण प्रक्रिया को लेकर गंभीर सवाल खड़े हो गए हैं। विभागीय सूत्रों, शिक्षकों और कर्मचारी संगठनों के बीच यह चर्चा तेजी से फैल रही है कि स्थानांतरण नीति का लाभ वास्तविक जरूरतमंद शिक्षकों को नहीं मिल रहा, बल्कि मुख्यमंत्री सचिवालय और स्कूल शिक्षा मंत्री के स्तर से होने वाले हस्तक्षेप के कारण पूरी प्रक्रिया विवादों के घेरे में आ गई है। वर्षों से स्थानांतरण की प्रतीक्षा कर रहे हजारों व्याख्याता और शिक्षक आज भी अपने आवेदन स्वीकृत होने का इंतजार कर रहे हैं, जबकि प्रभावशाली लोगों के प्रकरण तेजी से निपटाए जाने के आरोप लग रहे हैं।सूत्रों के अनुसार मुख्यमंत्री सचिवालय, स्कूल शिक्षा विभाग सचिवालय और लोक शिक्षण संचालनालय में स्थानांतरण से संबंधित हजारों आवेदन और अनुशंसा पत्र लंबित पड़े हुए हैं। इनमें बड़ी संख्या ऐसे व्याख्याताओं की है जो स्वास्थ्य, पारिवारिक परिस्थितियों, महिला सुरक्षा, दिव्यांगता अथवा अन्य गंभीर कारणों से स्थानांतरण चाहते हैं। आश्चर्यजनक स्थिति यह है कि प्रथम पदस्थापना से लेकर 10 से 15 वर्षों तक एक ही स्थान पर कार्यरत अनेक व्याख्याताओं के आवेदन भी वर्षों से फाइलों में दबे हुए हैं। इससे यह सवाल उठने लगा है कि आखिर सरकार की स्थानांतरण नीति का लाभ किसे और किन आधारों पर दिया जा रहा है।शिक्षा विभाग के जानकारों का कहना है कि विभागीय स्तर पर तैयार प्रस्तावों और अनुशंसाओं के बावजूद अंतिम निर्णयों में असामान्य विलंब हो रहा है। दूसरी ओर कुछ ऐसे मामलों में तेजी दिखाई गई है जिनमें संबंधित कर्मचारियों को उनकी पसंद के स्थानों पर पदस्थापना मिल गई। इसी कारण शिक्षकों के बीच यह धारणा मजबूत हो रही है कि स्थानांतरण प्रक्रिया में समानता और पारदर्शिता का अभाव है। यदि यह स्थिति सही है तो यह सरकार के सुशासन और पारदर्शी प्रशासन के दावों पर भी गंभीर प्रश्नचिह्न खड़ा करती है।शिक्षकों के बीच यह चर्चा भी आम हो गई है कि पूर्ववर्ती कांग्रेस सरकार के दौरान जिन आरोपों के कारण स्थानांतरण प्रक्रिया विवादों में रही थी, वैसी ही तस्वीर वर्तमान भाजपा सरकार के कार्यकाल में भी दिखाई देने लगी है। विभागीय सूत्रों के हवाले से यह आरोप लगाए जा रहे हैं कि आर्थिक रूप से सक्षम और राजनीतिक पहुंच रखने वाले कर्मचारियों के कार्य अपेक्षाकृत सरलता से हो रहे हैं, जबकि वास्तविक जरूरतमंद शिक्षक लगातार उपेक्षा का सामना कर रहे हैं। हालांकि इन आरोपों की आधिकारिक पुष्टि नहीं हुई है, लेकिन लगातार बढ़ती शिकायतों ने पूरे मामले को गंभीर बना दिया है।सबसे बड़ा सवाल यह है कि जब सरकार स्वयं सुशासन, पारदर्शिता और जवाबदेही की बात कर रही है, तब शिक्षा विभाग में स्थानांतरण जैसी महत्वपूर्ण प्रक्रिया को पूरी तरह पारदर्शी क्यों नहीं बनाया जा रहा। यदि मुख्यमंत्री सचिवालय और शिक्षा मंत्री कार्यालय के पास हजारों आवेदन लंबित हैं तो उनकी स्थिति सार्वजनिक क्यों नहीं की जा रही? यदि स्थानांतरण पूरी तरह नियमों और आवश्यकता के आधार पर हो रहे हैं तो चयन और अस्वीकृति के मानदंड सार्वजनिक करने में हिचकिचाहट क्यों है?शिक्षक संगठनों का कहना है कि सरकार को तत्काल सभी लंबित आवेदनों की समीक्षा कर सेवा अवधि, पारिवारिक परिस्थितियों और प्रशासनिक आवश्यकता के आधार पर निष्पक्ष निर्णय लेना चाहिए। साथ ही स्थानांतरण प्रक्रिया को ऑनलाइन और सार्वजनिक बनाकर यह स्पष्ट किया जाना चाहिए कि किस कर्मचारी का तबादला किन कारणों से किया गया और किन कारणों से रोका गया। जब तक ऐसा नहीं होता, तब तक मुख्यमंत्री सचिवालय और शिक्षा मंत्री की भूमिका को लेकर उठ रहे सवालों पर विराम लगना मुश्किल दिखाई देता है।प्रदेश के हजारों शिक्षक आज इसी प्रश्न का उत्तर तलाश रहे हैं कि आखिर स्थानांतरण नीति जरूरतमंद कर्मचारियों के लिए बनी है या फिर केवल प्रभाव और पहुंच रखने वाले लोगों के लिए। शिक्षा विभाग में बढ़ता असंतोष अब सरकार के लिए एक बड़ी प्रशासनिक और राजनीतिक चुनौती बनता जा रहा है, जिसका जवाब देर-सबेर मुख्यमंत्री सचिवालय और शिक्षा मंत्री को देना ही होगा।