विकास नंद/सर्वव्यापी
भारत के लोकतांत्रिक इतिहास में यदि दो प्रधानमंत्रियों के कार्यकाल की सबसे अधिक चर्चा होती है, तो वे हैं देश के प्रथम प्रधानमंत्री Jawaharlal Nehru और वर्तमान प्रधानमंत्री Narendra Modi। एक ने स्वतंत्र भारत की नींव रखी, तो दूसरे ने 21वीं सदी के भारत को वैश्विक मंच पर नई पहचान देने का प्रयास किया। प्रधानमंत्री मोदी के 12 वर्ष पूरे होने और लंबे समय तक सत्ता में बने रहने के कारण दोनों नेताओं की तुलना पर नई बहस शुरू हो गई है।
नेहरू का दौर: राष्ट्र निर्माण की चुनौती
1947 में आजादी के बाद भारत अनेक संकटों से जूझ रहा था। देश विभाजन की पीड़ा, शरणार्थी समस्या, कमजोर अर्थव्यवस्था, अशिक्षा और संस्थागत ढांचे के अभाव से घिरा था। ऐसे समय में जवाहरलाल नेहरू ने लोकतंत्र, संविधान और आधुनिक भारत की नींव मजबूत करने का कार्य किया।उनकी सबसे बड़ी उपलब्धि मजबूत लोकतांत्रिक संस्थाओं की स्थापना मानी जाती है। उन्होंने पंचवर्षीय योजनाओं के माध्यम से औद्योगिकीकरण को बढ़ावा दिया, सार्वजनिक क्षेत्र के बड़े उद्योग स्थापित किए और वैज्ञानिक अनुसंधान तथा उच्च शिक्षा संस्थानों को प्रोत्साहित किया। आज के अनेक प्रतिष्ठित संस्थान उनके समय में स्थापित हुए।हालांकि नेहरू के कार्यकाल को चुनौतियों और आलोचनाओं का भी सामना करना पड़ा। आर्थिक विकास की गति अपेक्षाकृत धीमी रही, कृषि क्षेत्र अपेक्षित स्तर तक नहीं पहुंच पाया और 1962 के भारत-चीन युद्ध ने उनकी विदेश नीति और सुरक्षा रणनीति पर गंभीर प्रश्न खड़े किए।
मोदी का दौर: विकास, डिजिटलीकरण और वैश्विक सक्रियता
2014 में सत्ता संभालने वाले नरेंद्र मोदी ऐसे समय में प्रधानमंत्री बने जब देश भ्रष्टाचार, आर्थिक सुस्ती और प्रशासनिक सुधारों की मांग से जूझ रहा था। पिछले 12 वर्षों में उनकी सरकार ने बुनियादी ढांचे, डिजिटल शासन और कल्याणकारी योजनाओं पर विशेष जोर दिया।
जनधन योजना, डिजिटल भुगतान प्रणाली, प्रत्यक्ष लाभ अंतरण (डीबीटी), स्वच्छ भारत अभियान, उज्ज्वला योजना, आयुष्मान भारत, जल जीवन मिशन और बड़े पैमाने पर सड़क, रेलवे तथा हवाई अड्डा विकास को उनकी प्रमुख उपलब्धियों में गिना जाता है। भारत की विदेश नीति भी अधिक सक्रिय दिखाई दी और वैश्विक मंचों पर भारत की उपस्थिति मजबूत हुई।
दूसरी ओर मोदी सरकार को भी कई चुनौतियों का सामना करना पड़ा। नोटबंदी, जीएसटी के शुरुआती प्रभाव, कोविड-19 महामारी, बेरोजगारी, महंगाई और सामाजिक ध्रुवीकरण जैसे मुद्दों पर विपक्ष ने लगातार सवाल उठाए। कृषि कानूनों को वापस लेने का निर्णय भी उनके कार्यकाल की महत्वपूर्ण राजनीतिक घटनाओं में शामिल रहा।
नेहरू और मोदी की तुलना वास्तव में दो अलग-अलग युगों की तुलना है। नेहरू को एक नवस्वतंत्र राष्ट्र को दिशा देने की चुनौती मिली थी, जबकि मोदी को वैश्विक प्रतिस्पर्धा के दौर में भारत को नई ऊंचाइयों तक ले जाने की जिम्मेदारी मिली। दोनों नेताओं ने अपने-अपने समय की परिस्थितियों के अनुसार भारत को प्रभावित किया है।
इतिहासकारों और राजनीतिक विश्लेषकों के लिए यह बहस आगे भी जारी रहेगी कि भारत के विकास में किसका योगदान अधिक निर्णायक रहा। लेकिन इतना निश्चित है कि आधुनिक भारत की कहानी नेहरू की नींव और मोदी के विस्तार—दोनों के बिना अधूरी मानी जाएगी।