छत्तीसगढ़ में 11,808 दुर्लभ पांडुलिपियों का दस्तावेजीकरण…महासमुंद बना प्रदेश का अग्रणी जिला, सदियों पुरानी ज्ञान परंपरा को मिला नया संरक्षण।

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विकास नंद /सर्वव्यापी

छत्तीसगढ़ की सांस्कृतिक, ऐतिहासिक और बौद्धिक विरासत को संरक्षित करने की दिशा में एक ऐतिहासिक उपलब्धि हासिल हुई है। भारत सरकार के संस्कृति मंत्रालय द्वारा संचालित ज्ञान भारतम् मिशन के तहत राज्य में 15 मार्च से 15 जून 2026 तक चलाए गए तीन माह के विशेष सर्वेक्षण अभियान में कुल 11 हजार 808 दुर्लभ पांडुलिपियों का दस्तावेजीकरण किया गया है। इस अभियान के माध्यम से सदियों पुराने प्राचीन ज्ञान को डिजिटल स्वरूप में सुरक्षित करने की दिशा में महत्वपूर्ण कदम उठाया गया है।

छत्तीसगढ़ शासन के संस्कृति विभाग के समन्वय से संचालित इस राज्यव्यापी सर्वेक्षण को ज्ञान भारतम् मोबाइल ऐप के माध्यम से पूरा किया गया। अभियान के दौरान निजी संग्रहों, प्राचीन मंदिरों, आश्रमों तथा पारिवारिक धरोहरों में संरक्षित ताड़पत्र एवं कागज पर लिखित बहुमूल्य पांडुलिपियों की पहचान कर उनका पंजीयन किया गया। इनमें ताड़पत्रों पर लिखी पांडुलिपियों की संख्या सर्वाधिक रही।

महासमुंद जिला रहा सबसे आगे

सर्वेक्षण के अनुसार महासमुंद जिले में 3,498 पांडुलिपियां दर्ज की गईं, जो राज्य में सर्वाधिक हैं। इसके साथ ही महासमुंद जिला प्रथम स्थान पर रहा। रायपुर जिले में 1,770, बस्तर में 1,610 तथा रायगढ़ में 1,553 पांडुलिपियां दर्ज की गईं। इसके अलावा कोरबा, सारंगढ़-बिलाईगढ़, राजनांदगांव, मुंगेली और कोरिया जिलों से भी बड़ी संख्या में दुर्लभ दस्तावेज प्राप्त हुए हैं।

भाषा और लिपियों की अनूठी विरासत

ज्ञान भारतम् मिशन के राज्य नोडल अधिकारी प्रभात सिंह ने बताया कि इन पांडुलिपियों में धर्म, आध्यात्म, कर्मकांड, आयुर्वेद, ज्योतिष, दर्शन, इतिहास और स्थापत्य कला से संबंधित महत्वपूर्ण जानकारियां दर्ज हैं। ताड़पत्रों पर मुख्य रूप से उड़िया भाषा और उड़िया लिपि का उपयोग मिला, जबकि कागज पर लिखित पांडुलिपियों में देवनागरी लिपि के साथ ब्रज और अवधी भाषाओं का प्रयोग देखने को मिला। यह विविधता छत्तीसगढ़ के प्राचीन सांस्कृतिक संपर्कों और ऐतिहासिक आदान-प्रदान की समृद्ध परंपरा को दर्शाती है।

मूल स्वामियों के पास ही रहेंगी सुरक्षित

प्रख्यात इतिहासकार डॉ. रमेंद्रनाथ मिश्र ने इसे भारतीय ज्ञान परंपरा के पुनर्जागरण की दिशा में महत्वपूर्ण पहल बताया। उन्होंने स्पष्ट किया कि शासन द्वारा केवल पांडुलिपियों का पंजीयन एवं दस्तावेजीकरण किया गया है। सभी पांडुलिपियां उनके मूल स्वामियों के पास ही सुरक्षित रहेंगी। इस दस्तावेजीकरण का उद्देश्य भविष्य में शोध, अध्ययन और संरक्षण को बढ़ावा देना है।

विलुप्त होती ज्ञान परंपराओं को मिलेगा नया जीवन

ज्ञान भारतम् मिशन केवल पांडुलिपियों की गणना भर नहीं, बल्कि भारतीय सभ्यता के बिखरे हुए ज्ञान को समेटने का राष्ट्रीय प्रयास है। जिस प्रकार नालंदा विश्वविद्यालय के विनाश से ज्ञान का विशाल भंडार नष्ट हो गया था, उसी प्रकार विलुप्त होती ज्ञान परंपराओं को संरक्षित करने की दिशा में यह अभियान नई उम्मीद लेकर आया है। इन 11,808 दुर्लभ पांडुलिपियों के डिजिटलीकरण से आने वाली पीढ़ियां अपने गौरवशाली अतीत और समृद्ध ज्ञान परंपरा से जुड़ सकेंगी।


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