तरुण कौशिक, संपादक सर्वव्यापी
पर्यावरण संरक्षण और वन संपदा की सुरक्षा के नाम पर हर वर्ष करोड़ों रुपये खर्च किए जाते हैं, लेकिन बिलासपुर संभाग अंर्तगत गौरेला-पेण्ड्रा-मरवाही जिले के मरवाही वन मंडल की ऐंठी बीट से सामने आई तस्वीरें और वीडियो इन दावों की सच्चाई को बेनकाब कर रहे हैं। जंगलों की सुरक्षा के लिए बनाई गई योजनाएं कागजों तक सीमित दिखाई दे रही हैं, जबकि जमीनी स्तर पर वन क्षेत्र पूरी तरह असुरक्षित और बदहाल नजर आ रहा है।ऐंठी बीट में सुरक्षा व्यवस्था की वास्तविक स्थिति चौंकाने वाली है। जिन क्षेत्रों को फेंसिंग और कंटीले तारों से सुरक्षित रखने के लिए सरकारी धन खर्च किया गया, वहां आज न तो फेंसिंग दिखाई दे रही है और न ही सुरक्षा का कोई ठोस इंतजाम। अधिकांश स्थानों पर खूंटे टूट चुके हैं और कंटीले तार पूरी तरह गायब हैं। परिणामस्वरूप आरक्षित वन क्षेत्र खुले चरागाह में तब्दील हो चुका है, जहां मवेशियों की निर्बाध आवाजाही से नवरोपित पौधे और प्राकृतिक वनस्पति लगातार नष्ट हो रही है।सबसे गंभीर पहलू सागौन सहित अन्य बहुमूल्य प्रजातियों के पेड़ों की अवैध कटाई का है। क्षेत्र में कई स्थानों पर कटे हुए वृक्षों के ठूंठ दिखाई दे रहे हैं, जो वन संपदा के संगठित दोहन की ओर संकेत करते हैं। स्थानीय लोगों का आरोप है कि लंबे समय से जंगलों में अवैध कटाई का खेल चल रहा है, लेकिन जिम्मेदार अधिकारी या तो इससे अनजान बने हुए हैं या फिर कार्रवाई करने में रुचि नहीं दिखा रहे हैं।वनों के लगातार सिकुड़ते दायरे का सबसे बड़ा दुष्प्रभाव वन्यजीवों पर पड़ रहा है। प्राकृतिक आवास नष्ट होने के कारण जंगली जानवर आबादी वाले क्षेत्रों की ओर बढ़ रहे हैं। इससे मानव-वन्यजीव संघर्ष की घटनाओं में वृद्धि की आशंका लगातार बढ़ रही है। विशेषज्ञों का मानना है कि यदि समय रहते जंगलों के संरक्षण के लिए प्रभावी कदम नहीं उठाए गए तो कई महत्वपूर्ण वन्यजीव प्रजातियों का अस्तित्व खतरे में पड़ सकता है।स्थिति केवल ऐंठी बीट तक सीमित नहीं बताई जा रही है। विश्वस्त सूत्रों के अनुसार मरवाही वन मंडल के कई अन्य क्षेत्रों में भी फेंसिंग, वन सुरक्षा और अवैध कटाई से जुड़े गंभीर प्रश्न उठ रहे हैं। करोड़ों रुपये के बजट के बावजूद यदि वन क्षेत्र सुरक्षित नहीं रह पा रहे हैं तो यह पूरी व्यवस्था की कार्यप्रणाली पर प्रश्नचिह्न खड़ा करता है।जनता का कहना है कि जंगलों की सुरक्षा के लिए आवंटित धनराशि का सही उपयोग सुनिश्चित किया जाए तथा फेंसिंग और अन्य संरक्षण कार्यों की उच्च स्तरीय निष्पक्ष जांच कराई जाए। साथ ही अवैध कटाई में शामिल लोगों और लापरवाही बरतने वाले जिम्मेदार अधिकारियों के खिलाफ कठोर कार्रवाई की जाए।अब सवाल यह है कि क्या वन विभाग इस गंभीर मामले को केवल औपचारिक जांच तक सीमित रखेगा, या फिर जंगलों को बचाने और दोषियों को जवाबदेह बनाने के लिए ठोस कदम उठाए जाएंगे? यदि समय रहते कार्रवाई नहीं हुई तो मरवाही की हरियाली और वन्यजीव दोनों ही गंभीर संकट का सामना करने को मजबूर होंगे। हम सबको पता है कि”जंगल बचेंगे तो पर्यावरण बचेगा, लेकिन यदि संरक्षण की राशि ही भ्रष्टाचार और लापरवाही की भेंट चढ़ती रही, तो आने वाली पीढ़ियां केवल हरियाली की कहानियां ही सुनेंगी।”