तरुण कौशिक, संपादक सर्वव्यापी
छत्तीसगढ़ में भाजपा सरकार को लगभग पौने तीन साल का कार्यकाल पूरा होने की ओर है, लेकिन अब तक संसदीय सचिव, निगम-मंडल आयोग, सहकारी बैंक, मंडी बोर्ड, विभिन्न प्राधिकरणों, नगर निगमों, नगर पालिकाओं और नगर पंचायतों में एल्डरमेन जैसी राजनीतिक नियुक्तियों का रास्ता साफ नहीं हो पाया है। इसके चलते भाजपा के जमीनी कार्यकर्ताओं और लंबे समय से संगठन के लिए काम कर रहे नेताओं में भारी नाराजगी और असंतोष की चर्चा तेज हो गई है।भाजपा कार्यकर्ताओं का कहना है कि विधानसभा चुनाव और लोकसभा चुनाव में दिन-रात मेहनत कर पार्टी को सत्ता तक पहुंचाने वाले कार्यकर्ताओं को आज भी राजनीतिक सम्मान और जिम्मेदारियों का इंतजार है। दूसरी ओर सरकार और संगठन के शीर्ष नेतृत्व की ओर से लगातार आश्वासन दिए जाने के बावजूद नियुक्तियों का मामला फाइलों और बैठकों से आगे नहीं बढ़ पा रहा है।राजनीतिक गलियारों में यह सवाल जोर पकड़ रहा है कि आखिर मुख्यमंत्री विष्णु देव साय और भाजपा प्रदेशाध्यक्ष किरण सिंह देवराजनीतिक नियुक्तियों को लेकर स्पष्ट निर्णय क्यों नहीं ले पा रहे हैं? कार्यकर्ताओं का आरोप है कि यदि सरकार बनने के पौने तीन साल बाद भी संगठन के समर्पित कार्यकर्ताओं को अवसर नहीं मिल रहा है तो यह भाजपा की कार्यकर्ता-आधारित राजनीति पर बड़ा प्रश्नचिन्ह है।भाजपा के अंदरखाने से यह आवाज भी उठ रही है कि राजनीतिक नियुक्तियों में हो रही देरी से न केवल कार्यकर्ताओं का मनोबल टूट रहा है, बल्कि स्थानीय स्तर पर संगठनात्मक सक्रियता भी प्रभावित हो रही है। कई वरिष्ठ कार्यकर्ता यह सवाल पूछ रहे हैं कि जब विपक्ष में रहते हुए भाजपा कांग्रेस सरकार पर राजनीतिक नियुक्तियों को लेकर सवाल उठाती थी, तब सत्ता में आने के बाद स्वयं भाजपा इस मामले में इतनी धीमी क्यों दिखाई दे रही है?निगम-मंडलों, आयोगों और सहकारी संस्थाओं में वर्षों से रिक्त पड़े पदों के कारण सरकार की नीतियों और योजनाओं के क्रियान्वयन पर भी असर पड़ने की चर्चा है। राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि इन संस्थाओं में जनप्रतिनिधियों और अनुभवी राजनीतिक कार्यकर्ताओं की भागीदारी शासन और जनता के बीच बेहतर समन्वय स्थापित करती है। लेकिन नियुक्तियां लंबित रहने से पूरा ढांचा नौकरशाही के भरोसे चल रहा है।भाजपा के कई कार्यकर्ताओं का कहना है कि सरकार और संगठन को यह समझना होगा कि केवल चुनावी जीत ही पर्याप्त नहीं होती, बल्कि कार्यकर्ताओं के सम्मान और उनकी राजनीतिक भागीदारी को सुनिश्चित करना भी उतना ही आवश्यक है। यदि जल्द निर्णय नहीं लिया गया तो यह नाराजगी आने वाले समय में संगठन के लिए चुनौती बन सकती है।अब सभी की निगाहें मुख्यमंत्री विष्णु देव साय और प्रदेशाध्यक्ष किरण सिंह देव पर टिकी हैं। सवाल यह है कि क्या भाजपा नेतृत्व कार्यकर्ताओं के धैर्य की परीक्षा लेना बंद करेगा या फिर राजनीतिक नियुक्तियों का मुद्दा यूं ही टलता रहेगा? सत्ता के गलियारों में यह चर्चा तेजी से फैल रही है कि यदि शीघ्र निर्णय नहीं हुआ तो कार्यकर्ताओं की नाराजगी खुलकर सामने आ सकती है और इसका राजनीतिक असर भी देखने को मिल सकता है।