संपादक की कलम से…*मुख्यमंत्री, मंत्री और अफसर सरकारी स्कूलों से दूर क्यों? जनता के बच्चों पर ही क्यों हो रहा शिक्षा सुधार का प्रयोग!**पीएमश्री और आत्मानंद स्कूलों पर करोड़ों खर्च, फिर भी व्यवस्था से जुड़े लोग निजी स्कूलों को ही क्यों मानते हैं बेहतर?

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तरुण कौशिक, संपादक सर्वव्यापी

छत्तीसगढ़ में शिक्षा सुधार के नाम पर पिछले कुछ वर्षों में बड़े-बड़े दावे किए गए हैं। पूर्ववर्ती सरकार ने स्वामी आत्मानंद उत्कृष्ट विद्यालयों का नेटवर्क खड़ा किया तो वर्तमान सरकार पीएमश्री विद्यालयों के माध्यम से सरकारी शिक्षा को नई पहचान देने की बात कर रही है। आधुनिक भवन, स्मार्ट क्लास, कंप्यूटर लैब, विज्ञान प्रयोगशालाएं, खेल सुविधाएं, अंग्रेजी माध्यम शिक्षा, प्रशिक्षित शिक्षकों की नियुक्ति और करोड़ों रुपये के बजट के साथ यह संदेश देने का प्रयास किया जा रहा है कि सरकारी स्कूल अब निजी विद्यालयों को टक्कर देने की स्थिति में हैं।लेकिन इन तमाम दावों के बीच एक ऐसा सवाल खड़ा है जिसका जवाब न तो सरकार के पास दिखाई देता है और न ही शिक्षा विभाग के अधिकारियों के पास। सवाल यह है कि यदि सरकारी स्कूल वास्तव में इतने उत्कृष्ट, आधुनिक और गुणवत्तापूर्ण हो चुके हैं, तो फिर मुख्यमंत्री, मंत्री, विधायक, सांसद, आईएएस, आईपीएस, राज्य प्रशासनिक सेवा के अधिकारी, जिला शिक्षा अधिकारी और यहां तक कि सरकारी शिक्षक स्वयं अपने बच्चों को इन स्कूलों में क्यों नहीं पढ़ाते?जमीनी स्तर पर स्थिति यह है कि सरकारी शिक्षा व्यवस्था का सबसे अधिक प्रचार करने वाले लोग भी अपने बच्चों के भविष्य की बात आते ही निजी स्कूलों का रुख कर लेते हैं। गांव का किसान, मजदूर, गरीब और निम्न मध्यम वर्ग अपने बच्चों को सरकारी स्कूलों में भेजने को मजबूर है, जबकि व्यवस्था संचालित करने वाले अधिकांश प्रभावशाली वर्ग निजी शिक्षा संस्थानों पर भरोसा करते हैं। यही वह विरोधाभास है जो सरकारी शिक्षा सुधार के दावों की वास्तविकता पर प्रश्नचिह्न लगाता है।राज्य में शिक्षा के नाम पर हर वर्ष अरबों रुपये खर्च किए जा रहे हैं। नए भवनों का निर्माण हो रहा है, फर्नीचर खरीदे जा रहे हैं, डिजिटल शिक्षा के नाम पर उपकरण लगाए जा रहे हैं, विभिन्न योजनाओं के तहत बजट जारी हो रहा है। लेकिन इसके बावजूद बड़ी संख्या में अभिभावक अपने बच्चों को सरकारी स्कूलों से निकालकर निजी विद्यालयों में दाखिला दिलाने का प्रयास कर रहे हैं। इसका कारण केवल सुविधाओं की कमी नहीं, बल्कि शिक्षा की गुणवत्ता को लेकर गहराता अविश्वास भी है।कई क्षेत्रों में आज भी सरकारी स्कूलों में बुनियादी शिक्षण स्तर चिंता का विषय बना हुआ है। कक्षा पांचवीं और आठवीं तक पहुंचने वाले अनेक विद्यार्थियों की पढ़ने, लिखने और गणना करने की क्षमता अपेक्षित स्तर तक नहीं पहुंच पाती। परीक्षा परिणामों और वास्तविक सीखने की क्षमता के बीच भी बड़ा अंतर देखने को मिलता है। ऐसे में केवल भवनों और योजनाओं को शिक्षा सुधार का प्रमाण मान लेना वास्तविक समस्या से आंखें मूंदने जैसा होगा।सबसे गंभीर प्रश्न जवाबदेही का है। यदि किसी मंत्री, विधायक, कलेक्टर, जिला शिक्षा अधिकारी, ब्लॉक शिक्षा अधिकारी या सरकारी शिक्षक का अपना बच्चा उसी सरकारी विद्यालय में पढ़ रहा हो, तो क्या वह विद्यालय की गुणवत्ता को लेकर उतना ही उदासीन रह पाएगा? क्या तब शिक्षक की अनुपस्थिति, शौचालय की बदहाली, प्रयोगशाला की कमी, कमजोर शिक्षण व्यवस्था और अव्यवस्था को उसी सहजता से नजरअंदाज किया जा सकेगा? संभवतः नहीं।शिक्षा के क्षेत्र में लंबे समय से यह मांग उठती रही है कि जनप्रतिनिधियों और सरकारी कर्मचारियों के बच्चों की शिक्षा को सरकारी विद्यालयों से जोड़ने पर गंभीर विचार होना चाहिए। समर्थकों का तर्क है कि जिस दिन मुख्यमंत्री, मंत्री, विधायक, सांसद, आईएएस, आईपीएस, कलेक्टर, जिला शिक्षा अधिकारी और सरकारी शिक्षक अपने बच्चों को सरकारी स्कूलों में पढ़ाने लगेंगे, उसी दिन सरकारी विद्यालयों की दशा और दिशा दोनों बदल जाएंगी। तब शिक्षा सुधार केवल भाषणों और विज्ञापनों का विषय नहीं रहेगा, बल्कि व्यक्तिगत जिम्मेदारी का प्रश्न बन जाएगा।हालांकि यह भी सच है कि सरकारी शिक्षा व्यवस्था की सभी कमियों के लिए केवल शिक्षकों को दोषी ठहराना उचित नहीं होगा। कई शिक्षक सीमित संसाधनों और कठिन परिस्थितियों में भी उत्कृष्ट कार्य कर रहे हैं। अनेक सरकारी विद्यालय बेहतर परिणाम भी दे रहे हैं। लेकिन व्यवस्था की समग्र तस्वीर आज भी संतोषजनक नहीं कही जा सकती। यही कारण है कि जनता और व्यवस्था के बीच विश्वास का अंतर लगातार बढ़ता जा रहा है।सरकारें यह तर्क देती हैं कि विद्यार्थियों को निशुल्क पुस्तकें, गणवेश, मध्यान्ह भोजन और अन्य सुविधाएं उपलब्ध कराई जा रही हैं। लेकिन अभिभावकों के लिए सबसे महत्वपूर्ण प्रश्न यह है कि उनके बच्चे को गुणवत्तापूर्ण शिक्षा मिल रही है या नहीं। यदि शिक्षा का स्तर अपेक्षित नहीं है, तो सुविधाओं की लंबी सूची भी लोगों का भरोसा वापस नहीं ला सकती।आज छत्तीसगढ़ के शिक्षा जगत में सबसे बड़ा प्रश्न किसी योजना, भवन या बजट का नहीं है। सबसे बड़ा प्रश्न विश्वास का है। और जब तक व्यवस्था से जुड़े लोग स्वयं सरकारी स्कूलों पर भरोसा नहीं दिखाते, तब तक जनता के मन में यह सवाल गूंजता रहेगा—”क्या शिक्षा सुधार वास्तव में बच्चों के भविष्य के लिए हो रहा है, या फिर जनता के बच्चों पर एक और सरकारी प्रयोग चल रहा है?”


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