नूर मोहम्मद, गौरेला पेंड्रा मरवाही(सर्वव्यापी)

मोहर्रम के दौरान डीजे,धुमाल, बैंड-बाजा, नाच-गाना और आतिशबाजी पर पूर्ण प्रतिबंध लगाने का दावा करने वाला छत्तीसगढ़ राज्य वक्फ बोर्ड का आदेश आखिरकार हाईकोर्ट की चौखट पर टिक नहीं सका। छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट ने इस आदेश के प्रभाव और संचालन पर तत्काल रोक लगाते हुए राज्यभर की मोहर्रम समितियों को बड़ी राहत दी है। विवाद की जड़ में 11 जून 2026 को छत्तीसगढ़ राज्य वक्फ बोर्ड के अध्यक्ष डॉ. सलीम राज द्वारा जारी वह आदेश है, जिसमें मोहर्रम, उर्स और अन्य इस्लामी धार्मिक आयोजनों में डीजे, धुमाल, बैंड-बाजा, आतिशबाजी सहित अन्य गतिविधियों पर पूर्ण प्रतिबंध लगाने की बात कही गई थी। इतना ही नहीं, आदेश में उल्लंघन करने वाली समिति पर ₹50,000 का जुर्माना लगाने और जरूरत पड़ने पर समिति को भंग करने जैसी चेतावनी भी दर्ज थी।क्या वक्फ बोर्ड को है ऐसा आदेश जारी करने का अधिकार? यही सबसे बड़ा सवाल अब कानूनी बहस का केंद्र बन गया है। सुफी इस्लामिक बोर्ड ने हाईकोर्ट में याचिका दायर कर दावा किया कि वक्फ बोर्ड धार्मिक जुलूसों और आयोजनों को नियंत्रित करने या जुर्माना लगाने का वैधानिक अधिकार नहीं रखता। याचिका में आदेश को मनमाना, अधिकार क्षेत्र से बाहर और धार्मिक परंपराओं में हस्तक्षेप बताया गया।आदेश में क्या था?वक्फ बोर्ड द्वारा जारी नोटिस में स्पष्ट रूप से कहा गया था कि मोहर्रम और उर्स में DJ, धुमाल, बैंड-बाजा, नाच-गाना और आतिशबाजी की अनुमति नहीं होगी।प्रतिबंधित गतिविधियां मिलने पर संबंधित समिति के खिलाफ कार्रवाई होगी।जरूरत पड़ने पर समिति को भंग किया जा सकता है। संबंधित समिति और इंतेजामिया पर ₹50,000 तक का जुर्माना लगाया जाएगा।मस्जिदों में इस आदेश का प्रचार-प्रसार करने के निर्देश भी दिए गए थे।हाईकोर्ट ने क्यों लगाई रोक? सुनवाई के दौरान न्यायालय को बताया गया कि मोहर्रम 26 जून को है और धार्मिक कार्यक्रमों की तैयारियां पहले से चल रही हैं। ऐसे समय में इस प्रकार के आदेश को लागू करने से सामाजिक असंतोष और शांति व्यवस्था प्रभावित हो सकती है। न्यायमूर्ति अमितेंद्र किशोर प्रसाद ने अपने आदेश में माना कि वर्तमान परिस्थितियों में विवादित आदेश का क्रियान्वयन लोगों में असंतोष पैदा कर सकता है। इसलिए अदालत ने अंतरिम राहत देते हुए 11 जून 2026 के नोटिस के प्रभाव और संचालन पर अगली सुनवाई तक रोक लगा दी।अब कटघरे में वक्फ बोर्ड?हाईकोर्ट के आदेश के बाद कई कानूनी और प्रशासनिक प्रश्न खड़े हो गए हैं—क्या वक्फ बोर्ड को धार्मिक जुलूसों पर प्रतिबंध लगाने का अधिकार है?किस कानून के तहत ₹50 हजार जुर्माने की चेतावनी दी गई?समिति को भंग करने की शक्ति वक्फ बोर्ड को कहां से प्राप्त हुई?क्या बिना कानूनी अधिकार के पूरे प्रदेश की समितियों को चेतावनी जारी की गई?इन सवालों के जवाब अब अदालत में तलाशे जाएंगे। मोहर्रम समितियों में राहत, बहस जारी हाईकोर्ट के स्टे आदेश के बाद प्रदेशभर की मोहर्रम समितियों और आयोजकों में राहत का माहौल है। वहीं यह मामला अब केवल धार्मिक आयोजन का नहीं, बल्कि संवैधानिक अधिकारों, प्रशासनिक शक्तियों और वैधानिक सीमाओं की बहस का विषय बन गया है।बड़ी बात हाईकोर्ट ने फिलहाल साफ संकेत दे दिया है कि मोहर्रम जैसे संवेदनशील धार्मिक अवसर पर ऐसे आदेशों का क्रियान्वयन, यदि वैधानिक आधार पर न हो, तो उससे सामाजिक तनाव की स्थिति उत्पन्न हो सकती है। अंतिम फैसला अभी बाकी है, लेकिन फिलहाल वक्फ बोर्ड का विवादित फरमान न्यायालय की रोक के कारण बेअसर हो चुका है।