विकास नंद/ सर्वव्यापी

महासमुंद जिले में अनुसूचित जनजाति (ST) एवं अनुसूचित जाति (SC) वर्ग के छात्रावासों एवं आश्रमों में करोड़ों रुपये की लागत से कराए जा रहे मरम्मत एवं निर्माण कार्यों की गुणवत्ता पर गंभीर सवाल उठने लगे हैं। सूत्रों से मिली जानकारी के अनुसार जिले के विभिन्न छात्रावासों में चल रहे कार्य तय समयसीमा के भीतर पूरे नहीं हुए हैं, वहीं कई स्थानों पर निर्माण कार्य गुणवत्ताहीन और अधूरा होने के बावजूद भुगतान किए जाने की चर्चा है।सबसे अधिक शिकायतें सरायपाली विकासखंड मुख्यालय स्थित अनुसूचित जाति पोस्ट मैट्रिक छात्रावास से सामने आई हैं। यहां शौचालय निर्माण अधूरा पड़ा है, पेयजल व्यवस्था अस्त-व्यस्त है तथा रंगाई-पुताई का कार्य भी पूरा नहीं हुआ है। इसके बावजूद छात्र-छात्राओं को उसी परिसर में रहना पड़ रहा है, जिससे उन्हें रोजाना भारी परेशानियों का सामना करना पड़ रहा है।सूत्रों का दावा है कि जिले के अधिकांश छात्रावासों में एक ही ठेकेदार को बड़े पैमाने पर कार्य आवंटित किए गए हैं। सवाल यह उठ रहा है कि जब एक ही ठेकेदार के पास पूरे जिले के अनेक कार्य हैं, तो वह निर्धारित समय में गुणवत्तापूर्ण कार्य कैसे पूरा कर पाएगा। यही कारण है कि कई जगह कार्य अधूरे हैं और गुणवत्ता पर भी सवाल खड़े हो रहे हैं।चर्चा यह भी है कि कई निर्माण कार्यों का भुगतान बिना छात्रावास अधीक्षकों के कार्य पूर्णता प्रमाण-पत्र (Completion Certificate) के किए जाने की तैयारी है। यदि यह सही है तो यह गंभीर प्रशासनिक अनियमितता मानी जाएगी। हालांकि इस संबंध में आधिकारिक पुष्टि होना अभी बाकी है।इस पूरे मामले में जब सरायपाली खंड प्रभारी एवं संबंधित छात्रावास अधीक्षकों से जानकारी लेने का प्रयास किया गया तो उन्होंने स्पष्ट जवाब देने से परहेज किया। इससे संदेह और गहरा गया है।उल्लेखनीय है कि सोशल मीडिया पर वायरल एक पत्र में आदिवासी विकास विभाग, महासमुंद द्वारा सुषासन तिहार 2026 के दौरान प्राप्त शिकायत के आधार पर बड़े साजापाली ग्राम पंचायत में लघु मरम्मत कार्यों की जांच के निर्देश दिए गए हैं। पत्र में यह भी उल्लेख है कि वर्ष 2025-26 में स्वीकृत कार्य निर्धारित समय में पूर्ण नहीं होने की शिकायत प्राप्त हुई थी तथा संबंधित कार्यों का निरीक्षण कर प्रतिवेदन प्रस्तुत करने के निर्देश दिए गए हैं। इससे यह संकेत मिलता है कि विभागीय स्तर पर भी निर्माण कार्यों को लेकर शिकायतें सामने आई हैं।
अब सबसे बड़ा सवाल यह है कि यदि शासन ने समयसीमा में कार्य पूर्ण करने के स्पष्ट निर्देश दिए थे, तो फिर इतने छात्रावासों में निर्माण कार्य अधूरे क्यों हैं? बच्चों के रहने के दौरान शौचालय, पानी और अन्य मूलभूत सुविधाओं के बिना उन्हें कैसे रखा जा रहा है? यदि कार्य गुणवत्ताहीन हैं तो इसके लिए जिम्मेदार कौन है—ठेकेदार, संबंधित अधिकारी या फिर दोनों?
स्थानीय लोगों और अभिभावकों ने मांग की है कि जिले के सभी ST एवं SC छात्रावासों और आश्रमों का उच्च स्तरीय तकनीकी निरीक्षण कराया जाए, निर्माण कार्यों की गुणवत्ता की जांच हो, भुगतान की प्रक्रिया की समीक्षा की जाए तथा दोषी पाए जाने वालों पर सख्त कार्रवाई की जाए, ताकि विद्यार्थियों को सुरक्षित एवं बेहतर सुविधाएं उपलब्ध हो सकें।


