भारतीय ज्ञान परंपरा को शिक्षा में समाहित करने की आवश्यकता : डॉ. प्रशांत बोकारे। - Sarvavyapi भारतीय ज्ञान परंपरा को शिक्षा में समाहित करने की आवश्यकता : डॉ. प्रशांत बोकारे। - Sarvavyapi

भारतीय ज्ञान परंपरा को शिक्षा में समाहित करने की आवश्यकता : डॉ. प्रशांत बोकारे।

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तरुण कौशिक, संपादक सर्वव्यापी

शिक्षा संस्कृति उत्थान न्यास, महाराष्ट्र के अध्यक्ष एवं गोंडवाना विश्वविद्यालय के कुलपति डॉ. प्रशांत बोकारे ने कहा है कि भारत की शिक्षा व्यवस्था का आधार भारतीय संस्कृति, जीवन-मूल्य, नैतिकता, आत्मनिर्भरता एवं सामाजिक उत्तरदायित्व होना चाहिए। भारतीय ज्ञान परंपरा, गुरु-शिष्य परंपरा तथा राष्ट्रीय शिक्षा नीति-2020 के मूल तत्वों को शिक्षा में समाहित कर ही भारत पुनः विश्वगुरु बनने की दिशा में आगे बढ़ सकता है। शिक्षा का उद्देश्य केवल ज्ञानार्जन नहीं, बल्कि विद्यार्थियों का सर्वांगीण व्यक्तित्व विकास होना चाहिए। वे शिक्षा संस्कृति उत्थान न्यास, वर्धा इकाई एवं राष्ट्रभाषा प्रचार समिति, वर्धा के संयुक्त तत्वावधान में शिक्षा संस्कृति उत्थान न्यास के स्थापना दिवस (भारतीय शिक्षा दिवस) के अवसर पर शनिवार को राष्ट्रभाषा प्रचार समिति के सभागार में आयोजित में संगोष्ठी में बतौर मुख्य अतिथि संबोधित कर रहे थे। विशिष्ट अतिथि विलास भास्कर राव ने शिक्षा को सामाजिक समरसता एवं राष्ट्रीय एकता का सशक्त माध्यम बताया। शिक्षा संस्कृति उत्थान न्यास के विदर्भ प्रांत संयोजक डॉ. मनोज पांडे ने भारतीय जीवन-दृष्टि, सांस्कृतिक मूल्यों एवं स्वदेशी चिंतन पर आधारित शिक्षा की आवश्यकता पर बल दिया। अध्यक्षीय उद्बोधन में राष्ट्रभाषा प्रचार समिति के प्रधानमंत्री डॉ. हेमचंद्र वैद्य ने भारतीय भाषाओं एवं नैतिक मूल्यों से युक्त शिक्षा को विकसित भारत का आधार बताया।कार्यक्रम का संचालन डॉ. जयंत उपाध्याय ने किया। प्रस्तावना डॉ. मीरा निचले ने रखी तथा डॉ. प्रकाश नारायण त्रिपाठी ने आभार माना। कार्यक्रम का शुभारंभ दीप प्रज्ज्वलन से तथा समापन वैदिक प्रार्थना एवं कल्याण मंत्र के साथ हुआ।इस अवसर पर शिक्षा संस्कृति उत्थान न्यास, वर्धा इकाई के अध्यक्ष प्रो. जनार्दन कुमार तिवारी, संयोजक डॉ. रणंजय कुमार सिंह, डॉ. गुंजन जैन, दुबे सर डॉ. विधु खरे, डॉ हर्षलता पेटकर, डॉ. जगदीश नारायण तिवारी, डॉ. प्रदीप, डॉ. अभिषेक सिंह, मणि दीप मिश्र, अखिलेश भारती, प्रिया माली सहित महात्मा गांधी अंतरराष्ट्रीय हिंदी विश्वविद्यालय के प्राध्यापक, शोधार्थी, विद्यार्थी, शिक्षाविद, सामाजिक कार्यकर्ता एवं विभिन्न संगठनों के प्रतिनिधियों की उपस्थिति रही।


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