गुड मॉर्निंग का जवाब भी नहीं! मंत्रालय में वरिष्ठ अफसरों के रवैये से कनिष्ठ अधिकारियों में बढ़ रही नाराजगी...प्रोटोकॉल निभाने वालों के संदेश भी अनदेखे, संवादहीनता पर उठने लगे सवाल। - Sarvavyapi गुड मॉर्निंग का जवाब भी नहीं! मंत्रालय में वरिष्ठ अफसरों के रवैये से कनिष्ठ अधिकारियों में बढ़ रही नाराजगी...प्रोटोकॉल निभाने वालों के संदेश भी अनदेखे, संवादहीनता पर उठने लगे सवाल। - Sarvavyapi

गुड मॉर्निंग का जवाब भी नहीं! मंत्रालय में वरिष्ठ अफसरों के रवैये से कनिष्ठ अधिकारियों में बढ़ रही नाराजगी…प्रोटोकॉल निभाने वालों के संदेश भी अनदेखे, संवादहीनता पर उठने लगे सवाल।

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तरुण कौशिक, संपादक सर्वव्यापी

छत्तीसगढ़ मंत्रालय में पदस्थ कुछ वरिष्ठ आईएएस अधिकारियों के व्यवहार को लेकर प्रशासनिक गलियारों में असंतोष की चर्चा तेज होती जा रही है। चर्चा यह है कि कई कनिष्ठ आईएएस, आईपीएस, आईएफएस और राज्य प्रशासनिक सेवा के अधिकारी अपने वरिष्ठ अधिकारियों को शिष्टाचारवश “गुड मॉर्निंग” या अन्य औपचारिक संदेश भेजते हैं, लेकिन उन्हें जवाब तक नहीं मिलता। इससे कनिष्ठ अधिकारियों में निराशा और असहजता का माहौल बन रहा है। हालांकि सेवा अनुशासन और प्रोटोकॉल के कारण कोई भी अधिकारी खुलकर अपनी नाराजगी व्यक्त नहीं कर रहा है।प्रशासनिक व्यवस्था में वरिष्ठ और कनिष्ठ अधिकारियों के बीच बेहतर संवाद को सुशासन की महत्वपूर्ण कड़ी माना जाता है। ऐसे में यदि वरिष्ठ अधिकारी अपने अधीनस्थ अधिकारियों के सामान्य शिष्टाचार वाले संदेशों की भी अनदेखी करते हैं, तो इससे केवल व्यक्तिगत दूरी ही नहीं बढ़ती, बल्कि कार्य संस्कृति पर भी नकारात्मक प्रभाव पड़ता है। कई अधिकारियों का मानना है कि एक छोटा-सा उत्तर भी अधीनस्थ अधिकारियों का मनोबल बढ़ा सकता है और उनके भीतर सम्मान की भावना को मजबूत करता है।जानकारों का कहना है कि मंत्रालय में कार्यरत कनिष्ठ अधिकारी अक्सर किसी महत्वपूर्ण विषय, प्रशासनिक मार्गदर्शन या समय लेकर मुलाकात करने के उद्देश्य से पहले संदेश भेजते हैं। यह पूरी तरह प्रोटोकॉल के अनुरूप प्रक्रिया होती है। लेकिन यदि ऐसे संदेशों को लगातार नजरअंदाज किया जाए तो स्वाभाविक रूप से यह संदेश जाता है कि वरिष्ठ अधिकारी संवाद स्थापित करने में रुचि नहीं रखते।यह स्थिति केवल अधिकारियों तक सीमित नहीं बताई जा रही है। कई जनप्रतिनिधि, पत्रकार और सामाजिक कार्यकर्ता भी बताते हैं कि वे औपचारिक रूप से समय मांगने या किसी जनहित के विषय पर चर्चा करने के लिए पहले संदेश भेजते हैं, लेकिन कई बार उन्हें कोई प्रतिक्रिया नहीं मिलती। इससे संवाद की प्रक्रिया प्रभावित होती है और जनसरोकारों से जुड़े विषयों के समय पर निराकरण में भी बाधा आ सकती है।प्रशासनिक विशेषज्ञों का मानना है कि किसी भी संगठन की सफलता केवल आदेश देने से नहीं, बल्कि संवाद, उपलब्धता और संवेदनशील व्यवहार से तय होती है। वरिष्ठ अधिकारियों का अनुभव और पद निश्चित रूप से महत्वपूर्ण है, लेकिन उनके व्यवहार में सहजता और संवाद की संस्कृति भी उतनी ही आवश्यक है। एक संक्षिप्त उत्तर—चाहे “ओके”, “बाद में बात करेंगे” या “समय लेकर आइए”—भी सामने वाले के प्रति सम्मान का संदेश देता है।सुशासन का मूल आधार केवल नीतियां और योजनाएं नहीं, बल्कि मानवीय व्यवहार भी है। यदि मंत्रालय के भीतर ही संवादहीनता की स्थिति बनी रहेगी, तो उसका असर प्रशासनिक कार्यप्रणाली पर भी पड़ सकता है। इसलिए अपेक्षा की जा रही है कि वरिष्ठ अधिकारी अपने कनिष्ठ अधिकारियों सहित जनप्रतिनिधियों, पत्रकारों और समाज के अन्य जिम्मेदार लोगों के संदेशों को गंभीरता से लें और संवाद की स्वस्थ परंपरा को बढ़ावा दें।नोट: यह समाचार प्रशासनिक गलियारों में प्रचलित चर्चाओं और सामान्य प्रवृत्ति पर आधारित है। इसमें किसी विशिष्ट अधिकारी के संबंध में आरोप नहीं लगाया गया है।


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