तरुण कौशिक, संपादक सर्वव्यापी
लोकतांत्रिक व्यवस्था में शासन-प्रशासन की सबसे बड़ी ताकत नियम, पारदर्शिता और जवाबदेही होती है। जब यही तीन आधार कमजोर पड़ने लगें तो आम जनता का विश्वास व्यवस्था से डगमगाने लगता है। आज कई विभागों में ऐसी शिकायतें सामने आ रही हैं, जहां नियमों के विपरीत कार्य होने के आरोप लगाए जा रहे हैं, दस्तावेजों और साक्ष्यों के साथ सवाल उठाए जा रहे हैं, लेकिन जिम्मेदार अधिकारी जवाब देने से बचते नजर आते हैं।सवाल यह नहीं है कि किसी विभाग पर आरोप लग गया, बल्कि गंभीर चिंता का विषय यह है कि आरोपों के साथ प्रस्तुत किए गए तथ्यों और दस्तावेजों पर भी प्रशासनिक स्तर पर स्पष्ट जवाब क्यों नहीं दिया जाता। लोकतंत्र में सवाल पूछना नागरिकों और मीडिया का अधिकार है, वहीं उन सवालों का जवाब देना जिम्मेदार पदों पर बैठे अधिकारियों का कर्तव्य है।किसी भी सरकारी विभाग में नियम इसलिए बनाए जाते हैं ताकि व्यवस्था निष्पक्ष और सुचारु रूप से संचालित हो सके। यदि किसी अधिकारी या कर्मचारी द्वारा नियमों की अनदेखी की जाती है तो उसकी जांच और कार्रवाई की जिम्मेदारी भी उसी प्रशासनिक तंत्र की होती है। लेकिन जब शिकायतकर्ता साक्ष्य प्रस्तुत करने के बाद भी महीनों तक जवाब का इंतजार करता रहे, तो यह स्थिति व्यवस्था की कार्यप्रणाली पर सवाल खड़े करती है।अक्सर देखा जाता है कि अधिकारी जवाब देने के बजाय फाइलों में मामले को लंबित रखते हैं या जांच के नाम पर समय निकालते रहते हैं। इससे न केवल शिकायतकर्ता निराश होता है बल्कि गलत कार्य करने वालों का मनोबल भी बढ़ता है। प्रशासन की निष्पक्षता तभी साबित होती है जब वह आरोपों की गंभीरता को समझते हुए तथ्यों के आधार पर निर्णय ले।यह भी समझना होगा कि मीडिया और जागरूक नागरिकों द्वारा उठाए गए सवाल शासन व्यवस्था को मजबूत करने का माध्यम हैं, न कि विरोध का स्वर। यदि किसी विभाग का काम नियमों के अनुरूप है तो उसे जवाब देने में कोई संकोच नहीं होना चाहिए। पारदर्शिता से ही विश्वास पैदा होता है।आज आवश्यकता है कि सभी विभाग अपने भीतर जवाबदेही की संस्कृति विकसित करें। शिकायतों को दबाने के बजाय उनका समयबद्ध निराकरण हो, साक्ष्यों की निष्पक्ष जांच हो और दोषी पाए जाने पर कार्रवाई की जाए। क्योंकि मौन रहना कई बार समस्या का समाधान नहीं, बल्कि संदेह को और गहरा करने वाला कदम बन जाता है।सरकारें बदलती रहती हैं, अधिकारी आते-जाते रहते हैं, लेकिन प्रशासनिक व्यवस्था की विश्वसनीयता स्थायी होनी चाहिए। नियमों की रक्षा और जनता के सवालों का सम्मान ही सुशासन की असली पहचान है। यदि जिम्मेदार अधिकारी ही जवाबदेही से बचेंगे तो फिर आम जनता किससे उम्मीद करेगी?सवाल उठते रहेंगे, लेकिन अब जरूरी है कि जिम्मेदार तंत्र उन सवालों का सामना भी करे। क्योंकि लोकतंत्र में जवाबदेही कोई विकल्प नहीं, बल्कि व्यवस्था की अनिवार्य जिम्मेदारी है।


