संपादक की कलम से… बिन मड़वा के बिहाव…

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तरुण कौशिक/ संपादक/

हमर देस के कई राज्य म अपन संस्कृति, रिती रिवाज अऊ परंपरा ल लोगन मन जीवित रखे हे, खासकर दक्षिण भारत के लोगन मन अपन संस्कृति, परंपरा अऊ रिती रिवाज ल सुघ्घर ढंग ले संभल के रखे हे,जिहा कोनों भी कारयकरम होथे ऊहा अपन संस्कृति, परंपरा,रिती रिवाज के अनुसार होथे। सादी-बिहाव ले लेके मरनी तक के कामकाज ह पूरा रिती- रिवाज, परंपरा अनुसार करे जाथे फेर आज हमर छत्तीसगढ राज्य म अब पहिली आईसन रिती रिवाज, संस्कृति, परंपरा के अनुसार कोनों कारयकरम नई होत पावत हे, जेकर कारण आज छत्तीसगढ़ राज्य ह दूसर राज्य म कोनों पहिचान नई बना पावत हे। हमर छत्तीसगढ राज्य म सादी -बिहाव घलोक म अब पहिली आईसन रिती रिवाज, परंपरा के पालन नई करें जात हे। जेमा सबसे महत्वपूर्ण परंपरा मड़वा हे फेर आज बिना मड़वा के सादी -बिहाव होत हवै,जऊन ह अब्बड़ पीरा के गोठ बात आए। हमर छत्तीसगढ राज्य म सादी -बिहाव के मड़वा म दो बांस के उपयोग करें जाथे अऊ अंगना म माटी म गाड़ देथे ,बांस मंडप के मुख्य आधार होथे। हमर छत्तीसगढ राज्य म जिहां बिहाव होथे ऊहा पूरा मड़वा म बांस के ऊपर, सबो अंगना म पेड़ के छोटे-छोटे डंगाल और पत्ता के झालर लटकाए जाथे, जेमा मुख्य रूप से डूमर, जामुन, महुआ अऊ आम के संगे संग पलसा पत्ता के डंडा अऊ ए सबों पेड़ के पत्ता ल लगाए जाथे फेर आज हमर छत्तीसगढ के ए परंपरा अऊ संस्कृति ह सिरागे हे। सहर ले लेके गांव घलोक म अब टेंट अऊ सो बाजी के कारण मड़वा के महत्व सिरागे हे। ईहा तक जून माटी खने के बेरा घलोक सुहासा अऊ सुहासिन के बीच नोंक झोंक, हंसी-मजाक ल लेके छत्तीसगढ़ी रिति रिवाज, परंपरा, संस्कृति के गीत ल कोनों नई गावत हे। एकर संगे संग छत्तीसगढ़ राज्य म सादी – बिहाव के आईसन – आईसन संस्कृति,परंपरा, रिती रिवाज हे, जेकर छत्तीसगढ़ के कोनों जगह सादी-बिहाव होए वो जगह के गोठ बात दूर पूरा गांव ही खुसी मनाए अऊ एला एक तिहार जईसन मनाए जावत रहिस फेर आज सब सहरीकरण होए के कारण लोगन मन अब सादी -बिहाव ल एक औपचारिकता के रुप म निभावत हे। जब मयं खुद पांच -दस बछर के रहेव तौ गांव-देहात के सादी -बिहाव ल देखके एक अलग ही मजा आवे,आज सादी -बिहाव के गाड़वा बाजा घलोक के जगह म डीजे,धूमाल बजत हे,जऊन ह लोगन ल बीमार करत हे,फेर अब आज के लईका मन के पसंद दूसर हे, गांव- देहात म सादी -बिहाव होए तौ पलसा पत्ता अऊ पूरईन पत्ता म जऊन खाना खाए के मजा आवे,अब ए सबों ह सिरागे हे अऊ आज के लईका मन ल अपन संस्कृति,परंपरा, रिती-रिवाज ल बताना जरुरी हे,ताकि आवईया हमर पीढी मन अपन बबा – बूढ़ी दाई, ममा दाई के यानि के हमर सियान मन के बनाए संस्कृति, परंपरा, रिती रिवाज ल मत भूलाए अऊ एला संरक्षित करे के दिसा म कामकाज करें। फिलहाल अभी तौ छत्तीसगढ़ म बिन मड़वा के सादी -बिहाव होत हवे,काबर के मड़वा म नई तौ आम, जामुन, डूमर,पलसा पत्ता नई बल्कि दो कन बांस ल टीना के डब्बा म रेती के सहारा गाड़ देथे अऊ सजावट करके सादी -बिहाव करे जात हे अऊ छत्तीसगढ़ी संस्कृति, परंपरा, रिती रिवाज के अनुसार कोनों पेड़ के डंडा,पत्ता नई लगाए जात हे,जेकर ले ए कहना कोनों गलत नई हे के हमर छत्तीसगढ म बिन मड़वा के सादी -बिहाव होत हवै। निश्चित रूप ले आज के सियान मन ल ए दिसा म आघू आए ल पड़ ही अऊ हमर सादी -बिहाव के रिती रिवाज, संस्कृति, परंपरा के अनुसार सादी -बिहाव करे बर जोर देना चाही..!


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