बदलाव की छांव में बिलासपुर: संजय अग्रवाल की छह महीने की तपस्या…एक बेदाग अधिकारी की विकास-यात्रा।

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तरुण कौशिक/संपादक सर्वव्यापी/

छत्तीसगढ़ की भूमि सदैव कर्मभूमि रही है — जहाँ सेवा, संकल्प और समाज के प्रति समर्पण ही किसी अधिकारी की पहचान बनती है। आज हम बात कर रहे हैं ऐसे ही एक सुचिंतित, संयमी और सहज अधिकारी की — संजय अग्रवाल, जो वर्तमान में बिलासपुर ज़िले के कलेक्टर हैं। उन्होंने महज छह महीनों के कार्यकाल में ही आम जनता से लेकर अधिकारियों तक के दिलों में अपनत्व और विश्वास की अमिट छाप छोड़ दी है।—बैगा समाज की ओर भरोसेमंद बढ़तबिलासपुर ज़िला विविधताओं से भरा है, परंतु बैगा आदिवासी समाज की स्थिति विशेष रूप से संवेदनशील रही है। संजय अग्रवाल ने न केवल इस समाज की समस्याओं को गंभीरता से समझा, बल्कि ठोस कार्यों से उनके जीवन में सकारात्मक हस्तक्षेप किया। वन अधिकार पत्रों का वितरण, स्वास्थ्य और पोषण योजनाओं का विस्तार, और शिक्षा की पहुँच जैसे विषयों पर उन्होंने तेज़ी से काम कर यह दिखा दिया कि प्रशासनिक संवेदनशीलता केवल दस्तावेज़ों में नहीं, जमीनी हकीकत में होनी चाहिए।

—बिलासपुर को दिलाया स्वच्छता में राष्ट्रपति पुरस्कार स्वच्छता का अर्थ केवल सफाई नहीं, बल्कि सामाजिक चेतना का प्रस्फुटन होता है। संजय अग्रवाल के नेतृत्व में बिलासपुर को राष्ट्रीय स्तर पर राष्ट्रपति पुरस्कार से सम्मानित किया गया, जो यह प्रमाणित करता है कि यदि अधिकारी जनभागीदारी से योजनाओं को लागू करे तो बदलाव निश्चित है। स्कूलों, बस्तियों, और बाजारों तक उन्होंने अभियान चलाकर जनचेतना की अलख जगाई।

—खरसिया की माटी से जन्मा जनसेवक छत्तीसगढ़ के खरसिया जैसे शांत, ग्रामीण अंचल से निकलकर प्रशासन के सर्वोच्च पथ पर पहुँचना अपने आप में प्रेरक है। संजय अग्रवाल ने इस बात को सिद्ध कर दिया कि यदि लक्ष्य स्पष्ट हो और दृष्टिकोण लोक-हितकारी, तो सीमाएं केवल भ्रम होती हैं।

—छह वर्ष तक एसडीएम, फिर बेदाग कलेक्टर प्रशासनिक सेवा में लगातार छह वर्षों तक बिलासपुर में एसडीएम के रूप में कार्य कर, और फिर उसी जिले के कलेक्टर के रूप में पदस्थ होना, यह कम ही देखने को मिलता है। इस लंबे कार्यकाल में उनका एक भी विवाद न होना, कोई आरोप न लगना, और जनता के बीच लोकप्रियता बढ़ना— यह सब दर्शाता है कि ईमानदारी आज भी सबसे बड़ी ताक़त है।—जनसंपर्क का नया प्रारूप गढ़ाजहाँ अधिकतर अधिकारी आमजन से दूरी बनाए रखते हैं, वहाँ संजय अग्रवाल ने सीधा जन-संवाद स्थापित किया। वे ग्रामीण क्षेत्रों में जाकर लोगों की समस्याएं सुनते हैं, हाट-बाज़ार बैठकों में भाग लेते हैं, विद्यालयों में बच्चों से संवाद करते हैं, और हर विभागीय बैठक में व्यवहारिक समाधान निकालते हैं। यही कारण है कि आज अधिकारी वर्ग भी उन्हें “पहला ऐसा कलेक्टर” मानता है जिसने छह महीनों में ही अपनी कार्यशैली से अलग पहचान बना ली है।

—हर व्यक्ति तक सहज पहुँच — कोई दरवाज़ा बंद नहीं

कई बार जनता को कलेक्टर से मिलने के लिए महीने भर इंतजार करना पड़ता है, परंतु संजय अग्रवाल का कार्यालय एक खुले संवाद केंद्र की तरह है

— जहाँ किसान, छात्र, महिला समूह, व्यापारी, पत्रकार सभी बेझिझक पहुँचते हैं। उनका मानना है कि जनता की समस्या को सुनना ही प्रशासन का पहला कर्तव्य है।

—अंतिम शब्दसंजय अग्रवाल उन चुनिंदा अधिकारियों में से हैं, जो केवल पद से नहीं, बल्कि व्यवहार, विचार और विनम्रता से पहचाने जाते हैं। उन्होंने यह प्रमाणित किया है कि सच्चे प्रशासनिक अधिकारी वही हैं जो “फाइलों” से बाहर आकर “मुकाबले” में उतरें।बिलासपुर के इतिहास में शायद यह पहली बार हो रहा है जब कोई कलेक्टर छह महीनों में ही जन-सरोकारों के नायक बन चुके है।एक चर्चा जो चल रही है…यद्यपि संजय अग्रवाल को जनता, अधिकारी और कर्मचारी वर्ग एक ईमानदार, मेहनती और सहज व्यवहार वाले अधिकारी के रूप में जान रहा है, लेकिन बिलासपुर की राजनीतिक गलियों में एक विशेष चर्चा भी इन दिनों ज़ोरों पर है। कहा जा रहा है कि उनका पदस्थापन बिलासपुर के वरिष्ठ जनप्रतिनिधि एवं विधायक अमर अग्रवाल की अनौपचारिक अनुशंसा पर हुआ है, ताकि शहर के व्यापारी वर्ग की समस्याओं और आवश्यकताओं को सुगमता से प्रशासनिक समर्थन मिल सके।

हालांकि, यह चर्चा महज़ राजनीतिक विश्लेषणों और कयासों तक ही सीमित है, और इसका कोई आधिकारिक पक्ष सामने नहीं आया है। साथ ही, यह भी महत्वपूर्ण है कि संजय अग्रवाल ने अपनी कार्यशैली से अब तक किसी भी पक्ष विशेष के प्रति झुकाव नहीं दिखाया है। वे हर वर्ग के लिए समान रूप से उपलब्ध रहे हैं

— चाहे वह किसान हो, व्यापारी हो या ग्रामीण महिला समूह।इसलिए यदि यह चर्चा कुछ हद तक सच भी हो, तो भी यह नहीं नकारा जा सकता कि संजय अग्रवाल ने अपने काम और व्यवहार से खुद को किसी भी पूर्वग्रह से ऊपर रखा है। उन्होंने यह साबित किया है कि “किसी की पसंद से आए व्यक्ति को भी अपनी पहचान खुद बनानी होती है।”


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