तरुण कौशिक/ संपादक सर्वव्यापी/
छत्तीसगढ़ में भाजपा की सरकार बनने के 19 महीने बाद भी मंत्रिमंडल के कुछ सदस्य अब तक पार्टी संगठन के पदों पर काबिज हैं। यह स्थिति न केवल राजनीतिक दृष्टिकोण से असमंजस पैदा कर रही है, बल्कि यह प्रशासनिक दृष्टि से भी मर्यादा और जवाबदेही पर सवाल खड़े कर रही है। मंत्रिपद की शपथ लेने के बाद संगठनात्मक जिम्मेदारियों से इस्तीफा देना सामान्य राजनीतिक शिष्टाचार होता है, लेकिन छत्तीसगढ़ में इसका पालन नहीं किया जा रहा।भाजपा ने 2023 में कांग्रेस की मजबूत छत्तीसगढ़िया पहचान वाली सरकार को हराकर अप्रत्याशित जीत दर्ज की थी। तत्कालीन मुख्यमंत्री भूपेश बघेल की संस्कृति, भाषा और परंपरा आधारित राजनीति को चुनौती देते हुए भाजपा ने सत्ता में वापसी की।
केंद्र के मार्गदर्शन में मुख्यमंत्री विष्णु देव साय के नेतृत्व में मंत्रिमंडल का गठन किया गया, जिसमें सामाजिक समीकरणों को साधते हुए नए और पुराने चेहरों को शामिल किया गया।लेकिन सरकार गठन के बाद भी कई मंत्री और निगम-मंडलों में नियुक्त भाजपा नेता अब तक संगठन के पदों से इस्तीफा नहीं दिए हैं।
यह स्थिति भाजपा के “एक व्यक्ति, एक पद” के सिद्धांत के भी विरुद्ध है। सरकार द्वारा निगम, मंडल, आयोग और बोर्ड में नियुक्त किए गए कई नेताओं ने आज तक अपने राजनीतिक पद नहीं छोड़े हैं, जिससे संगठन और सरकार के बीच स्पष्टता का अभाव दिख रहा है।
विशेषज्ञों का मानना है कि संवैधानिक जिम्मेदारियों के साथ राजनीतिक पदों को बनाए रखना हितों के टकराव को जन्म देता है और इससे जनता में गलत संदेश जाता है। भाजपा को चाहिए कि वह संगठन में स्पष्ट रूप से नई कार्यकारिणी का गठन करे और जो मंत्री या पदाधिकारी सरकार में हैं, वे संगठन पदों से इस्तीफा दें।
इसके साथ ही संगठन में वरिष्ठ, अनुभवशील लेकिन चुनाव हारे हुए पूर्व विधायकों को उचित सम्मान देते हुए मार्गदर्शक की भूमिका दी जानी चाहिए। इससे संगठन और सरकार के बीच बेहतर तालमेल बन सकेगा और जनता के बीच भाजपा की छवि एक जिम्मेदार और अनुशासित पार्टी की बनेगी।
वर्तमान में मुख्यमंत्री विष्णु देव साय और प्रदेशाध्यक्ष किरण सिंह देव इस दिशा में कोई ठोस पहल करते नहीं दिख रहे हैं, जिससे कार्यकर्ताओं और जनता के बीच असंतोष पनपने लगा है।
यदि भाजपा समय रहते अपने संगठनात्मक ढांचे में बदलाव नहीं करती, तो आगामी चुनावों में सत्ता में वापसी की उम्मीद धूमिल हो सकती है।