सरकारी स्कूलों की बदहाली पर उठते सवाल: खुद सरकारी शिक्षक क्यों नहीं भरोसा करते सरकारी स्कूलों पर…?

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तरुण कौशिक/संपादक सर्वव्यापी/

छत्तीसगढ़ सहित पूरे देश में केंद्र और राज्य सरकारें सरकारी स्कूलों में शिक्षा की गुणवत्ता सुधारने के नाम पर हर वर्ष करोड़ों रुपए खर्च कर रही हैं। इसके बावजूद सरकारी स्कूलों की स्थिति दिन-ब-दिन और भी अधिक जर्जर होती जा रही है। विडंबना यह है कि खुद सरकारी शिक्षक, अधिकारी, विधायक, सांसद, यहां तक कि मंत्री तक अपने बच्चों को निजी स्कूलों में पढ़ाने को मजबूर हैं।शिक्षा के इस विरोधाभास ने एक बड़ा सवाल खड़ा कर दिया है—जब खुद सरकारी शिक्षक और अफसर अपने बच्चों के भविष्य के लिए सरकारी स्कूलों पर भरोसा नहीं कर पा रहे हैं, तो आम जनता से यह उम्मीद कैसे की जा सकती है?वर्तमान में अधिकांश मंत्री, विधायक, सांसद, वरिष्ठ प्रशासनिक अधिकारी और उच्च पदों पर आसीन लोग खुद सरकारी स्कूलों से पढ़कर इस मुकाम तक पहुंचे हैं। बावजूद इसके, इन स्कूलों की गिरती हालत पर कोई ठोस पहल नहीं हो रही है।बीते दो दशकों में सरकारी स्कूलों की छवि इतनी खराब हो चुकी है कि अब चतुर्थ श्रेणी के कर्मचारी तक अपने बच्चों को निजी स्कूलों में भेजना बेहतर समझते हैं, भले ही वहां शिक्षा की गुणवत्ता संदिग्ध हो और मनमानी फीस वसूली होती हो।यह स्थिति तब और चिंताजनक हो जाती है जब सरकारें मुफ्त किताबें, यूनिफॉर्म, साइकिल और यहां तक कि दोपहर का भोजन तक उपलब्ध करा रही हैं, फिर भी सरकारी स्कूलों में छात्रों का आंकड़ा लगातार गिरता जा रहा है।विशेषज्ञों का मानना है कि इसके पीछे सबसे बड़ा कारण सरकारी शिक्षकों का अपने कर्तव्यों के प्रति अनुत्तरदायी होना है। जब शिक्षक खुद शिक्षा को गंभीरता से नहीं लेंगे और अपने बच्चों को निजी स्कूलों में पढ़ाएंगे, तो सरकारी स्कूलों की साख और स्तर दोनों पर असर पड़ेगा।यह भी सवाल उठता है कि जब सरकारें निजी स्कूलों की मनमानी और फीस नियंत्रण को लेकर चुप हैं, तो आखिर किसके हित की रक्षा की जा रही है? शिक्षा धीरे-धीरे व्यवसाय बन चुकी है, और शिक्षा के नाम पर हो रहे इस गोरखधंधे को बंद करने के लिए सरकार को सख्त कदम उठाने की जरूरत है।सरकारी स्कूलों की वर्तमान स्थिति को देखकर यह स्पष्ट कहा जा सकता है कि जब तक इस व्यवस्था में ईमानदारी से सुधार नहीं होगा और शिक्षा विभाग में पारदर्शिता नहीं लाई जाएगी, तब तक सरकारी स्कूल सिर्फ कागजों में ही सुधार की कहानियां सुनाते रहेंगे।सरकार को चाहिए कि वह सिर्फ घोषणाओं तक सीमित न रहकर ज़मीनी सच्चाई को समझे और शिक्षा की आड़ में हो रहे भ्रष्टाचार पर सख्त कार्रवाई करे। तभी सरकारी स्कूलों की खोई हुई गरिमा वापस लाई जा सकेगी और आम नागरिक का भरोसा फिर से बहाल होगा।


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