तरुण कौशिक/संपादक सर्वव्यापी/
प्रेस जन- शिक्षण के साथ जनमत निर्माण का माध्यम है। यही कारण है कि भारत में पत्रकारिता की शुरुआत के साथ ही उस पर अंकुश लगाने के निरंतर प्रयास हुए हैं। इसका एक लम्बा इतिहास है। भारत के स्वतंत्रता आन्दोलन में प्रेस की अत्यंत महत्वपूर्ण भूमिका रही है। प्रेस के लिए समय समय पर जो कड़े कानून लाये गये उसके कारण अनेक समाचारपत्रों के संचालक व सम्पादकों को जीवन में अनेक कष्ट उठाने पड़े।’महात्मा गांधी अंतरराष्ट्रीय हिन्दी विश्वविद्यालय वर्धा महाराष्ट्र के विधि विभाग में विद्यार्थियों के बीच आमंत्रित- विद्वान जयन्त सिंह तोमर ने प्रेस – विधि पर केन्द्रित व्याख्यान में यह बात कही। दो दिन की व्याख्यान श्रृंखला क्रमशः भारत में प्रेस संबंधी कानून व भारतीय प्रेस परिषद पर केन्द्रित थी। व्याख्यान के अवसर विश्वविद्यालय के विधि विभाग के अधिष्ठाता प्रो. जनार्दन कुमार तिवारी,वरिष्ठ अध्यापक आनन्द भारती, अध्यापिका डॉ. दिव्या शुक्ला , डॉ. परमानन्द राठौर, डॉ. अभिषेक सिंह, सुश्री पूर्वा जैन, शताक्षी दीक्षित, शील खांडेकर , पूजा फूलबांधे की उपस्थिति रही। जयंत सिंह तोमर ने भारतीय प्रेस परिषद की रूपरेखा व उद्देश्य पर बोलते हुए कहा कि यह एक आत्म- नियामक तंत्र है।
उसका स्वरूप ऐसा बनाया गया है जिससे कोई बाहरी और आंतरिक दबाव काम न कर सकें। महात्मा गांधी चाहते थे कि प्रेस लोकरुचि के स्तर को ऊंचा उठाये।
भारतीय प्रेस परिषद का भी यही उद्देश्य है। इस उद्देश्य की प्राप्ति में जनसंचार माध्यमों के पाठक , दर्शक व नागरिकों की सक्रियता की भी बड़ी आवश्यकता है।