तखतपुर/ श्याम मूरत कौशिक/ ब्यूरो चीफ सर्वव्यापी छत्तीसगढ़ भाजपा प्रदेशाध्यक्ष किरण सिंह देव की नई कार्यकारिणी के ऐलान ने बिलासपुर जिले के कुर्मी समाज में असंतोष की लहर पैदा कर दी है। सूची में जिले के एक भी कुर्मी नेता को स्थान नहीं मिला, जबकि इस समाज ने दशकों से भाजपा को बूथ स्तर से लेकर विधानसभा तक मजबूत आधार दिया है।बिलासपुर भाजपा में कुर्मी समाज हमेशा चुनावी समय में रीढ़ की हड्डी की तरह रहा है।
घनश्याम कौशिक, ज्योतिष कश्यप, कृष्ण कुमार कौशिक, विश्राम कौशिक, ललित कौशिक, धर्मेन्द्र चंद्राकर,संतोष कौशिक ‘गुरुजी’, प्रदीप कौशिक, नरेश कौशिक, ज्ञानचंद कौशिक, दुर्गेश कौशिक और सौरभ कौशिक जैसे नेता वर्षों से मैदान में सक्रिय हैं।
इनकी पहचान सिर्फ मेहनतकश कार्यकर्ता की नहीं, बल्कि जमीनी जननेता की है।फिर सवाल उठता है, इतनी सक्रिय और सक्षम टीम के बावजूद इन्हें पूरी तरह दरकिनार क्यों किया गया?
क्या यह महज़ रणनीतिक चूक है, या किसी गुटीय राजनीति का स्पष्ट संकेत?
राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि हाल के वर्षों में भाजपा का संगठनात्मक संतुलन सामाजिक आधार से हटकर कुछ गुटों की पसंद-नापसंद पर ज्यादा निर्भर हो गया है। बिलासपुर में कुर्मी समाज एक बड़ा और निर्णायक वोट बैंक है।
यदि यह उपेक्षा जारी रही, तो इसका असर सीधे चुनावी समीकरण पर पड़ेगा और वह भी भाजपा के लिए नुकसानदेह हो सकता है।
फिलहाल, ज़्यादातर कुर्मी नेता सार्वजनिक बयान देने से बच रहे हैं, लेकिन अंदरखाने की चर्चा साफ़ है, यह चुप्पी असंतोष की आंधी से पहले की खामोशी है।