तरुण कौशिक/संपादक, सर्वव्यापी/
छत्तीसगढ़ की सड़कों पर मवेशियों का जमावड़ा अब आम दृश्य बन चुका है। चाहे राजधानी रायपुर हो या फिर बिलासपुर, कोरबा, जांजगीर-चांपा,रायगढ़ जैसे बड़े शहर, हर जगह मुख्य सड़कों, चौक–चौराहों और यहां तक कि राजमार्गों पर भी खुलेआम मवेशी घूमते हुए नजर आते हैं। सड़क पर अचानक बैठ जाने वाले या झुंड बनाकर खड़े मवेशियों के कारण आए दिन दुर्घटनाएं हो रही हैं। कई बार तो जानलेवा हादसे भी हो चुके हैं।छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट ने बार-बार इस मामले को गंभीरता से लेते हुए राज्य सरकार और नगरीय निकायों को फटकार लगाई है। अदालत ने साफ शब्दों में कहा कि सार्वजनिक सड़कों पर मवेशियों का जमावड़ा आम जनता के जीवन के लिए खतरा है और यह नागरिक अधिकारों का हनन भी है। बावजूद इसके, प्रशासन और नगर निगम स्तर पर केवल औपचारिक कार्यवाही होती दिखती है। समय-समय पर अभियान चलाने की घोषणाएं होती हैं, परंतु उनका असर टिकाऊ नहीं होता।यातायात पुलिस और स्वास्थ्य विभाग के आंकड़े बताते हैं कि सड़क दुर्घटनाओं में एक बड़ा हिस्सा मवेशियों की वजह से होता है। दोपहिया वाहन चालक अचानक सामने आए जानवर से टकराकर गंभीर रूप से घायल हो जाते हैं। ग्रामीण इलाकों से शहरों तक मवेशियों की भरमार से न केवल यातायात बाधित होता है, बल्कि स्वच्छता व्यवस्था पर भी विपरीत असर पड़ रहा है। सड़कों पर गंदगी और गोबर से संक्रमण फैलने का खतरा हमेशा बना रहता है।इस गंभीर समस्या की जड़ में प्रशासनिक लापरवाही और नगरीय निकायों की कमजोर कार्यप्रणाली है। नगर निगम और नगर पंचायतों के पास गौशालाओं का संचालन करने की जिम्मेदारी है, लेकिन जमीनी हकीकत यह है कि अधिकांश गौशालाएं या तो कागजों पर चल रही हैं या फिर क्षमता से कहीं कम मवेशियों को संभाल पा रही हैं।इस मुद्दे पर राजनीतिक इच्छाशक्ति की कमी भी साफ नजर आती है। सरकारें और जनप्रतिनिधि अक्सर इसे धार्मिक और भावनात्मक दृष्टिकोण से देखने लगते हैं, लेकिन असलियत यह है कि यह सड़क सुरक्षा और आम नागरिकों के जीवन से जुड़ा प्रश्न है। कई सामाजिक संगठन और स्वयंसेवी संस्थाएं भी इस दिशा में काम कर रही हैं, लेकिन प्रशासन के सहयोग के बिना समस्या का स्थायी समाधान संभव नहीं है। इस समस्या से निपटने के लिए दीर्घकालिक नीति की आवश्यकता है।वहीं प्रत्येक शहर और कस्बे में पर्याप्त संख्या में संचालित गौशालाओं की व्यवस्था हो। खुलेआम मवेशियों को सड़कों पर छोड़ने वाले पशुपालकों पर जुर्माना और कानूनी कार्रवाई की जाए। मवेशियों की पहचान और निगरानी के लिए टैगिंग एवं जीपीएस आधारित सिस्टम लागू हो।नागरिकों को भी इस समस्या की गंभीरता को समझाते हुए सहयोग के लिए प्रेरित किया जाए।छत्तीसगढ़ की सड़कों पर मवेशियों की समस्या केवल कानून-व्यवस्था या नगर निगम की जिम्मेदारी नहीं है, बल्कि यह एक सामाजिक चुनौती भी है। हाईकोर्ट की लगातार फटकार के बावजूद यदि स्थिति जस की तस बनी हुई है तो यह स्पष्ट संकेत है कि केवल कागजी कार्यवाही से समस्या का समाधान नहीं होने वाला। सरकार, प्रशासन और समाज,सभी को मिलकर ठोस कदम उठाने होंगे, अन्यथा यह समस्या आने वाले दिनों में और भी भयावह रूप ले सकती है।