कवर्धा/चेतन साहू/ ब्यूरो चीफ/ सर्वव्यापी/
छत्तीसगढ़ की राजनीति में इन दिनों हलचल तेज है। मुख्यमंत्री विष्णु देव साय के नेतृत्व में लगभग कल 18 अगस्त की शाम राजभवन में मंत्रिमंडल विस्तार का कार्यक्रम प्रस्तावित है। सूत्रों के अनुसार तीन नए मंत्रियों को शपथ दिलाई जा सकती है। यह कदम सत्ता संचालन को संतुलन देने और संगठन के समीकरणों को साधने की दृष्टि से अहम माना जा रहा है।लेकिन मंत्रिमंडल विस्तार के साथ ही एक और बड़ा सवाल राजनीतिक गलियारों में उठ रहा है, क्या मुख्यमंत्री अपने विदेश दौरे पर रवाना होने से पहले संसदीय सचिवों और शेष बचे निगम, मंडल, आयोग, बोर्डों में नियुक्तियों की घोषणा भी करेंगे?दरअसल, अभी जिन संस्थाओं में अध्यक्ष की नियुक्तियां लंबित हैं, उनमें अधिकांश “मलाईदार” पद नहीं माने जाते। इनमें सिर्फ एक प्रमुख आयोग है , छत्तीसगढ़ राजभाषा आयोग। यह आयोग राज्य की राजभाषा छत्तीसगढ़ी को बढ़ावा देने और उसे सरकारी कामकाज तथा सामाजिक-सांस्कृतिक जीवन में सशक्त बनाने का कार्य करता है।बीते वर्षों में इस आयोग में अध्यक्ष पद पर प्रायः बुजुर्ग साहित्यकारों को ही जिम्मेदारी दी गई है। वह भी एक ही जातिगत पृष्ठभूमि से लोगों को तवज्जो मिलने की चर्चा रही है। ऐसे में इस बार यह मांग उठ रही है कि आयोग की कमान किसी युवा चेहरे को सौंपी जाए। विशेषकर पत्रकारिता जगत से किसी सक्रिय और युवा व्यक्ति को जिम्मेदारी देने की आवाज बुलंद हो रही है। तर्क यह दिया जा रहा है कि पत्रकार समाज की नब्ज को पकड़ते हैं, जनता के साथ सीधे संवाद में रहते हैं और छत्तीसगढ़ी भाषा के प्रचलन तथा प्रचार-प्रसार के लिए नई सोच और ऊर्जा के साथ काम कर सकते हैं।यदि सरकार इस बार राजभाषा आयोग की बागडोर किसी युवा पत्रकार को सौंपती है तो यह छत्तीसगढ़ी भाषा को नई दिशा देने का अवसर हो सकता है। भाषा केवल साहित्य की चौहद्दी में सीमित नहीं है, बल्कि शासन-प्रशासन, मीडिया, शिक्षा और तकनीक में भी उसका उपयोग बढ़ाने की आवश्यकता है।हालांकि, दूसरी ओर आलोचकों का मानना है कि सरकार ने अब तक आयोगों और बोर्डों को राजनीतिक संतुलन साधने का मंच बनाया है, न कि नीतिगत कामकाज को मजबूत करने का। ऐसे में राजभाषा आयोग में भी केवल नियुक्ति की औपचारिकता न होकर, कार्ययोजना आधारित दृष्टिकोण अपनाना जरूरी है।छत्तीसगढ़ की राजनीति इस समय निर्णायक मोड़ पर है। मंत्रिमंडल विस्तार तो तत्कालीन जरूरत है, लेकिन संसदीय सचिवों और आयोग–बोर्ड में नियुक्तियां भी शासन की प्राथमिकता सूची में शामिल होनी चाहिए। विशेषकर राजभाषा आयोग में यदि सरकार परंपरा से हटकर युवा और पत्रकारिता क्षेत्र से जुड़े व्यक्ति को जिम्मेदारी देती है, तो यह न केवल सकारात्मक संदेश देगा बल्कि छत्तीसगढ़ी भाषा आंदोलन को भी नई ऊर्जा मिल सकती है।