तरुण कौशिक/संपादक सर्वव्यापी/
छत्तीसगढ़ की राजनीति में भाजपा सरकार इन दिनों कठघरे में खड़ी है। लंबे समय से टल रहे मंत्री मंडल विस्तार ने न सिर्फ सरकार की साख पर सवाल खड़े कर दिए हैं, बल्कि संगठन और विधायकों में भी असंतोष गहराता जा रहा है। मुख्यमंत्री विष्णु देव साय लगातार समय निकालते जा रहे हैं, लेकिन ठोस निर्णय लेने से बचते दिख रहे हैं।सवाल यह है कि आखिर सरकार संसदीय सचिवों की नियुक्ति, शेष निगम–मंडल–आयोग–बोर्ड और मुख्यमंत्री के सलाहकारों की तैनाती जैसे अहम मसलों पर कब तक टालमटोल करेगी? भाजपा के अंदर ही यह चर्चा तेज है कि यदि मुख्यमंत्री ने अपने विवेक से अब निर्णायक कदम नहीं उठाया तो पार्टी को इसका सीधा नुकसान आगामी विधानसभा चुनाव में भुगतना पड़ेगा।राजनीतिक गलियारों में यह धारणा बन चुकी है कि सत्ता और संगठन की खींचतान में सरकार की कार्यक्षमता प्रभावित हो रही है। जनता तक संदेश साफ जा रहा है कि भाजपा सरकार आंतरिक संघर्षों और पदों की खींचतान में उलझी है, जबकि राज्य की जनता बुनियादी समस्याओं से जूझ रही है।कल प्रस्तावित कैबिनेट बैठक के बाद मुख्यमंत्री विदेश यात्रा पर रवाना होंगे। राजनीतिज्ञों का मानना है कि यदि यात्रा से पहले नियुक्तियों पर मुहर नहीं लगाई गई तो यह देरी भाजपा की फजीहत को और बढ़ा देगी।आज की राजनीति में देरी और असमंजस ही विपक्ष को हथियार देती है। सवाल सीधा है, क्या मुख्यमंत्री साहसिक निर्णय लेंगे, या भाजपा सरकार आंतरिक दुविधाओं में उलझकर खुद अपनी हार की जमीन तैयार करेगी?