तरुण कौशिक/संपादक सर्वव्यापी/
छत्तीसगढ़ ही नहीं, बल्कि पूरे भारत की पुलिस व्यवस्था पर सबसे बड़ा सवाल रिश्वतखोरी का है। थानों में बैठे थाना प्रभारी से लेकर विवेचना अधिकारी तक, केवल आरोपियों से ही नहीं बल्कि न्याय की आस लेकर पहुंचने वाले पीड़ित आवेदकों से भी पैसों की मांग करते हैं।जहां एक ओर शासन-प्रशासन पुलिस सुधार और पारदर्शिता की बातें करता है, वहीं जमीनी स्तर पर स्थिति बिल्कुल उलट है। थानों में दर्जनों ऐसे मामले रोज देखने को मिलते हैं, जहां फरियादी को अपनी ही एफआईआर दर्ज कराने या विवेचना आगे बढ़वाने के लिए जेब ढीली करनी पड़ती है। कई मामलों में तो आवेदक की शिकायत बिना “नज़राना” दिए महीनों तक लंबित रखी जाती है।लोगों का कहना है कि पुलिसिंग व्यवस्था में यह प्रवृत्ति लंबे समय से जड़ जमाए बैठी है और इससे आम नागरिक का विश्वास पुलिस से टूटता जा रहा है। यही वजह है कि आम आदमी थाने जाने से कतराने लगा है।कानून विशेषज्ञों और सामाजिक कार्यकर्ताओं का मानना है कि पुलिसिंग में जवाबदेही और पारदर्शिता लाने के लिए कड़े कदम उठाने होंगे। भ्रष्टाचार निरोधक तंत्र को और सशक्त बनाकर शिकायतकर्ताओं को सीधे रिपोर्ट करने का अवसर दिया जाए, तभी इस स्थिति में सुधार संभव है।फिलहाल जरूरत इस बात की है कि सरकार और पुलिस विभाग इस जमीनी सच्चाई को स्वीकार करे और व्यवस्था में वास्तविक सुधार की दिशा में कदम उठाए।