जेलों में कैदियों का भोजन बना ‘मानवाधिकार हनन’ का कारण।

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तरुण कौशिक /संपादक सर्वव्यापी/

छत्तीसगढ़ के केंद्रीय और जिला जेलों की बदहाल व्यवस्थाएँ लगातार कैदियों और विचाराधीन बंदियों के जीवन पर प्रश्नचिह्न खड़े कर रही हैं। सबसे बड़ी समस्या जेलों में परोसे जा रहे खानपान को लेकर है, जो न केवल अस्वच्छ है बल्कि पोषण मानकों से भी कोसों दूर है। यह स्थिति मानवाधिकार हनन की श्रेणी में आने लगी है।जेल सूत्रों का कहना है कि राज्य की अधिकांश जेलों में भोजन की गुणवत्ता बेहद खराब है। कैदियों को तय समय पर भोजन नहीं मिल पाता।अक्सर दाल और सब्जियों में कीड़े मिलने की शिकायतें सामने आती हैं।रोटियां अधपकी और कड़ी होती हैं।चावल में पथरीले दाने और मिट्टी मिलना आम बात हो गई है। दूध और फल जैसी पौष्टिक चीज़ें नाम मात्र की भी उपलब्ध नहीं कराई जातीं।जेल मैनुअल और सुप्रीम कोर्ट के निर्देशों के अनुसार कैदियों और विचाराधीन बंदियों को मानवोचित आहार, स्वास्थ्य और सुरक्षा मिलना चाहिए। परंतु वास्तविकता इसके उलट है। कई जेलों में प्रतिदिन केवल “जीवित रहने लायक भोजन” ही परोसा जा रहा है, जो उनके शारीरिक और मानसिक स्वास्थ्य के लिए घातक है।जेल सूत्रों के अनुसार, कई बार बंदियों ने भोजन की गुणवत्ता को लेकर विरोध दर्ज कराया, लेकिन जेल प्रशासन शिकायतों को दबा देता है। जो कैदी आवाज़ उठाते हैं, उन्हें अनुशासनहीनता के नाम पर दंडित भी किया जाता है। जिसके कारण स्वास्थ्य पर असर पड़ रहा है। अस्वच्छ और अधपोषित भोजन के कारण कैदियों में कुपोषण,एनीमिया,पाचन संबंधी रोग,त्वचा रोग,मानसिक अवसाद तेजी से बढ़ रहे हैं। स्वास्थ्य शिविरों में लगातार बड़ी संख्या में कैदी बीमार पाए जा रहे हैं।वहीं छत्तीसगढ़ की जेलों की क्षमता से कई गुना अधिक कैदी बंद हैं। रायपुर सेंट्रल जेल की क्षमता लगभग 1100 है, जबकि बंदियों की संख्या 2500 से ऊपर है। बिलासपुर, जगदलपुर और अंबिकापुर जैसे जिलों की जेलों में भी यही हाल है। ओवरक्राउडिंग के कारण भोजन वितरण और भी बिगड़ गया है।वहीं इस पूरे मामले पर मानवाधिकार आयोग और जेल सुधार समितियों को समय-समय पर निरीक्षण करना चाहिए, लेकिन शिकायतों के बावजूद ठोस कार्रवाई नहीं हो रही। इससे यह सवाल उठ रहा है कि क्या कैदियों को इंसान नहीं समझा जाता?कैदियों और विचाराधीन बंदियों को भी संविधान ने मौलिक अधिकार दिए हैं। जेल की सजा का अर्थ सिर्फ “आवागमन की स्वतंत्रता का हनन” है, न कि उन्हें अमानवीय जीवन जीने पर मजबूर करना। छत्तीसगढ़ की जेलों में खानपान और स्वास्थ्य सुविधाओं को लेकर जो बदहाल स्थिति बनी हुई है, वह राज्य की न्यायिक और प्रशासनिक संवेदनशीलता पर बड़ा सवाल खड़ा करती है।


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