विनोबा भावे की 131वीं जयंती पर पवनार आश्रम में हुआ प्रेरणादिवस का आयोजन।

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तरुण कौशिक/ संपादक सर्वव्यापी/

“जय जगत” का अमर संदेश देने वाले आचार्य विनोबा भावे की 131वीं जयंती पर रविवार को पवनार आश्रम में आयोजित समारोह में जिलेभर से लोग आए। श्रद्धा और उत्साह से भरे इस आयोजन में विद्यार्थियों व शोधार्थियों ने विनोबा भावे के जीवन-दर्शन पर विचार रखते हुए उन्हें नई पीढ़ी के लिए प्रेरणा-स्रोत बताया। महात्मा गांधी अंतरराष्ट्रीय हिंदी विश्वविद्यालय, वर्धा महाराष्ट्र के शिक्षकों एवं विद्यार्थी समूह सहभागी रहे। जनसंचार विभाग के सहायक आचार्य डॉ. संदीप वर्मा और डॉ. रेणु सिंह अपने विद्यार्थियों के साथ कार्यक्रम में उपस्थित रहे। छात्रों ने विनोबा भावे के बचपन, संस्कारों और विचारों पर वक्तव्य प्रस्तुत किए।स्वामी विवेकानंद इंटरनेशनल स्कूल की छात्रा अक्षरा ने विनोबा भावे के बचपन और उनकी मां से मिले संस्कारों पर प्रकाश डाला, वहीं पवनार के सरकारी स्कूल के छात्र कार्तिक घुघरे ने बताया कि चतुर्थी के दिन जन्म लेने पर उनका नाम विनायक रखा गया और मां से ही उन्हें संस्कृत अध्ययन की प्रेरणा मिली।पीएचडी शोधार्थी श्रुतिकीर्ति ने कहा कि भूदान आंदोलन अहिंसा का अनुपम उदाहरण था, जिसे रक्तहीन क्रांति भी कहा जाता है। हिंदी विश्वविद्यालय की छात्रा सेजल ढोले ने विनोबा भावे को राष्ट्रीय अध्यापक बताते हुए कहा कि उनकी शिक्षा और विचार आज भी समाज का मार्गदर्शन करते हैं। अपने उद्बोधन में डॉ. संदीप वर्मा ने कहा कि संतों और महात्माओं से हमें विचार स्रोत व ऊर्जा मिलती है जो जीवन दृष्टि को सार्थक बनाती है। बाबा के पुरुषार्थ व महान कृतियों को याद करते हुए उन्होंने कहा, “जो बाबा ने कहा था कि जय जगत, वही हमें याद रखना चाहिए। सत्य प्रेम करुणा को आत्मसात करना चाहिए ताकि जीवन व्यर्थ न जाए।”इसी क्रम में 94 वर्षीय ऊषा दीदी, जो 1959 से ब्रह्मविद्या मंदिर में रह रही हैं, ने अपने अनुभव साझा किए। उन्होंने बताया कि विनोबा भावे को पढ़ने और घूमने का विशेष शौक था। उनको पास 50,000 श्लोक कंठस्थ थे और वे कहा करते थे कि खुले आकाश के नीचे घूमने से आकाश का स्पर्श मिलता है और शब्द आकाश से उतरते हैं। सेवा और श्रम उनके जीवन का अभिन्न हिस्सा रहा।कार्यक्रम के अंत में सभी उपस्थितों ने एक स्वर से संकल्प लिया कि आचार्य विनोबा भावे की जयंती केवल औपचारिकता नहीं, बल्कि प्रेरणा-दिवस के रूप में हर वर्ष मनाई जाएगी, ताकि उनका ग्राम्यजीवन और विचार आने वाली पीढ़ियों तक जीवित रह सके।


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