तरुण कौशिक/ संपादक सर्वव्यापी/
छत्तीसगढ़ की राजनीति इन दिनों एक विचित्र प्रशासनिक प्रयोग का केंद्र बनी हुई है। जनता के मन में सवाल उठने लगे हैं ,आखिर राज्य का वास्तविक मुखिया कौन है? संविधान के अनुसार मुख्यमंत्री विष्णु देव साय राज्य के कार्यकारी प्रमुख हैं, लेकिन हाल के दिनों में राज्यपाल रमेन डेका की सक्रियता ने प्रशासनिक गलियारों में हलचल मचा दी है।राज्यपाल डेका ने बीते कुछ हफ्तों में जिन प्रकार से जिलों का दौरा किया, अफसरों की बैठकों में सीधे निर्देश दिए, कामकाज की समीक्षा की और फील्ड निरीक्षण किए । उसने यह धारणा मजबूत कर दी है कि वे केवल औपचारिक राज्यपाल नहीं, बल्कि “सक्रिय प्रशासक” की भूमिका निभा रहे हैं। यह सक्रियता असामान्य इसलिए मानी जा रही है क्योंकि राज्यपाल का दायित्व संविधान के अनुच्छेद 153 से 162 तक सीमित है, जिसमें शासन संचालन की प्रत्यक्ष जिम्मेदारी मंत्रिपरिषद और मुख्यमंत्री की होती है।विपक्ष का आरोप है कि राज्य में “दोहरी सरकार” जैसी स्थिति बन गई है। एक ओर मुख्यमंत्री विष्णु देव साय शासन-प्रशासन चलाने का दावा कर रहे हैं, वहीं दूसरी ओर राज्यपाल हर जिले में अफसरों को निर्देश दे रहे हैं, जिससे नौकरशाही दो आदेशों के बीच भ्रम की स्थिति में है।कुछ वरिष्ठ प्रशासक इसे “संविधान की मर्यादा से खेल” बताते हैं, जबकि सत्तारूढ़ दल के कुछ नेता इसे “राज्यपाल की सक्रिय संवैधानिक चिंता” कहकर उचित ठहराते हैं।राजनीतिक विश्लेषकों का कहना है कि छत्तीसगढ़ के इतिहास में ऐसा पहली बार हुआ है जब कोई राज्यपाल मुख्यमंत्री से भी ज्यादा सक्रियता दिखा रहा है। आम जनता के बीच यह चर्चा भी है कि “यदि राज्यपाल ही दौरे करेंगे, समीक्षा लेंगे, अफसरों को दिशा देंगे, तो मुख्यमंत्री की भूमिका आखिर है क्या?”इस परिस्थिति ने राज्य की प्रशासनिक रेखाओं को धुंधला कर दिया है। निचले स्तर के अधिकारी यह तय नहीं कर पा रहे कि आदेश किसका सर्वोपरि है। वहीं मुख्यमंत्री कार्यालय की चुप्पी और राज्यपाल सचिवालय की बढ़ती सक्रियता आने वाले दिनों में संवैधानिक बहस का विषय बन सकती है।राजनीति के गलियारों में अब यह सवाल गूंज रहा है कि छत्तीसगढ़ का असली शासक कौन? संविधान का निर्वाचित मुख्यमंत्री या सक्रिय राज्यपाल?जनता को जवाब चाहिए, क्योंकि शासन में “दो हाथ” नहीं, एक दिशा जरूरी है।


