कबीरधाम/चेतन साहू/ब्यूरोचीफ सर्वव्यापी/
छत्तीसगढ़ की अस्मिता और मातृभाषा के सम्मान का प्रतीक राजभाषा आयोग आज भी अध्यक्ष विहीन है। मुख्यमंत्री विष्णु देव साय के कार्यकाल को कई महीने बीत चुके हैं, मगर अब तक आयोग में अध्यक्ष की नियुक्ति नहीं की जा सकी है। सवाल यह उठ रहा है कि आखिर मुख्यमंत्री छत्तीसगढ़ी भाषा के प्रति गंभीर क्यों नहीं दिख रहे हैं?पांच साल तक कांग्रेस सरकार में यह पद खाली रहा, और अब भाजपा सरकार के सत्ता में आने के बाद भी छत्तीसगढ़ी भाषा को अपेक्षित सम्मान नहीं मिल पा रहा है। लोगों में चर्चा है कि क्या विष्णु देव साय भी अपने पूर्ववर्ती डॉ. रमन सिंह की तरह उम्रदराज़ ब्राह्मण या परंपरागत साहित्यकारों को ही अध्यक्ष बनाएंगे, या फिर इस बार किसी युवा, कर्मठ और जमीनी छत्तीसगढ़ी भाषा प्रेमी को यह जिम्मेदारी सौंपी जाएगी?राजभाषा आयोग कोई राजनीतिक पद नहीं है ,यह भाषा, संस्कृति और साहित्य से जुड़े विशेषज्ञों का मंच है, जहाँ किसी भी दलगत या जातिगत सोच से ऊपर उठकर निर्णय लिया जाना चाहिए। इस आयोग का उद्देश्य केवल सम्मान समारोह नहीं, बल्कि छत्तीसगढ़ी भाषा की शैक्षणिक, प्रशासनिक और सामाजिक पहचान को मजबूत करना है।मुख्यमंत्री विष्णु देव साय को चाहिए कि वे इस विषय पर राजनीति से हटकर अपने विश्वासपात्र मुख्य सचिव विकास शील और प्रमुख सचिव सुबोध कुमार सिंह से गंभीरता से विचार-विमर्श करें।राजभाषा आयोग की अध्यक्षता ऐसे व्यक्ति को मिलनी चाहिए जो छत्तीसगढ़ी भाषा, साहित्य और पत्रकारिता के क्षेत्र में सक्रिय योगदान दे रहा हो ,न कि केवल वरिष्ठता या जातिगत समीकरणों के आधार पर चुना गया हो।प्रदेश की जनता अब यह देखना चाहती है कि मुख्यमंत्री विष्णु देव साय छत्तीसगढ़ी भाषा की प्रतिष्ठा के लिए साहसिक और संवेदनशील निर्णय ले पाएंगे या नहीं।


