भक्ति और संस्कृति के रंगों में रँगा बोड़सरा श्यामकार्तिक महोत्सव का भव्य समापन...45 वर्षों से निरंतर चली आ रही है बोड़सरा की श्यामकार्तिक परंपरा। - Sarvavyapi भक्ति और संस्कृति के रंगों में रँगा बोड़सरा श्यामकार्तिक महोत्सव का भव्य समापन...45 वर्षों से निरंतर चली आ रही है बोड़सरा की श्यामकार्तिक परंपरा। - Sarvavyapi

भक्ति और संस्कृति के रंगों में रँगा बोड़सरा श्यामकार्तिक महोत्सव का भव्य समापन…45 वर्षों से निरंतर चली आ रही है बोड़सरा की श्यामकार्तिक परंपरा।

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तरुण कौशिक/संपादक सर्वव्यापी/

जाँजगीर ग्राम बोड़सरा में चल रहे दस दिवसीय श्यामकार्तिक महोत्सव का आयोजन सांस्कृतिक रंगों से सराबोर रहा। पूरे ग्राम में श्रद्धा, उल्लास और छत्तीसगढ़ी संस्कृति की सुगंध फैली रही।ज्ञात हो कि बोड़सरा में श्यामकार्तिक महोत्सव की परंपरा पिछले 45 वर्षों से निरंतर चली आ रही है। इस वर्ष का आयोजन 27 अक्टूबर से प्रारंभ हुआ था, जिसमें प्रतिदिन रंगारंग सांस्कृतिक कार्यक्रमों का आयोजन किया गया।महोत्सव के अंतिम दिवस 5 नवम्बर को प्रदेश की लोकप्रिय लोकगायिका आरु साहू ने अपनी मधुर आवाज़ और छत्तीसगढ़ी गीतों की सुरधारा से ऐसा वातावरण बनाया कि पूरा मैदान तालियों की गड़गड़ाहट से गूंज उठा।उनके साथ मंच पर उपस्थित टीम ने लोकवाद्य और पारंपरिक नृत्य की प्रस्तुति देकर पूरे माहौल को उत्सवमय बना दिया।आरु साहू ने ‘काली काली महाकाली’ और ‘तितली तितली बन मैं उड़ जाऊं रे’ जैसे प्रसिद्ध गीत प्रस्तुत किए, जिन पर दर्शक झूम उठे। उनकी प्रस्तुतियों ने छत्तीसगढ़ की लोक परंपराओं की सुंदर झलक पेश की।कार्यक्रम को देखने के लिए लोगों की भारी भीड़ उमड़ी रही। गांव पूरे अतिथियों से भरा रहा, हर घर में मेहमान थे, गलियों में पैर रखने की जगह नहीं थी। बच्चे, महिलाएं और बुजुर्ग सभी श्यामकार्तिक महोत्सव की सांस्कृतिक शाम का आनंद लेने पहुंचे।स्टेज के आसपास उत्साह और उल्लास का दृश्य देखते ही बनता था।महोत्सव के दौरान हनुमान चौक राजापारा, खैरवार पारा और पालीभांठा ग्राम में भी ख्यातिलब्ध कलाकारों ने मंच संभाला। उनकी प्रस्तुतियों ने दर्शकों का मन मोह लिया।इस दौरान जसगीत,कवि सम्मेलन,पंडवानी विधा की प्रस्तुति जैसे विभिन्न कार्यक्रम आयोजित हुएमेला स्थल पर झूले, फूड स्टॉल और विविध प्रदर्शनियों ने श्रद्धालुओं को आकर्षित किया। लोग पूरे उत्साह से इनका आनंद उठाते रहे।पुलिस और पंचायत प्रशासन द्वारा पूरे आयोजन स्थल पर सुव्यवस्थित प्रबंधन किया गया। सुरक्षा, यातायात, साफ-सफाई और प्रकाश व्यवस्था की पुख्ता तैयारी की गई थी।महोत्सव का यह अंतिम दिन बोड़सरा ग्राम के लिए यादगार बन गया जहां एक ओर छत्तीसगढ़ी ग्राम्य संस्कृति की आत्मा जीवंत हुई, वहीं दूसरी ओर कलाकारों की प्रतिभा ने यह संदेश दिया कि ग्राम्य संस्कृति की माटी में कला और संस्कृति की परंपरा आज भी उतनी ही सशक्त और जीवंत है जितनी पहले थी।महोत्सव के अंतिम दिवस भगवान श्यामकार्तिक की प्रतिमाओं का विसर्जन विधि-विधानपूर्वक किया गया। कर्मा नृत्य की थाप और जयघोषों के साथ पूरा वातावरणश्यामकार्तिक भगवान की जयके नारों से गूंज उठा।श्रद्धा और उल्लास से भरा यह दृश्य बोड़सरा की धरती को भक्ति और संस्कृति के रंगों से अनुपम बना गया।आयोजन समिति ने सभी ग्रामवासियों के सहयोग, समस्त अतिथियों के स्नेह, तथा आयोजन की सफलता में प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष रूप से योगदान देने वाले सभी व्यक्तियों साथ ही जिला पुलिस एवं पंचायत प्रशासन के प्रति हार्दिक आभार व्यक्त किया है।


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