तरुण कौशिक, संपादक, सर्वव्यापी
छत्तीसगढ़ में प्रशासनिक जवाबदेही और अधिकारियों के स्थानांतरण की नीति एक बार फिर चर्चा के केंद्र में है। एक ओर बेमेतरा में मुख्यमंत्री कन्या विवाह योजना के तहत आयोजित सामूहिक विवाह समारोह में प्रोटोकॉल और व्यवस्थाओं को लेकर सार्वजनिक रूप से गंभीर सवाल उठे, वहीं दूसरी ओर गौरेला-पेंड्रा-मरवाही (जीपीएम) जिले के तत्कालीन कलेक्टर डॉ. संतोष देवांगन का अपेक्षाकृत कम समय में स्थानांतरण कर दिया गया। इन दोनों घटनाओं ने प्रशासनिक निर्णयों के मापदंडों को लेकर नई बहस छेड़ दी है।बेमेतरा में आयोजित मुख्यमंत्री कन्या विवाह योजना के सामूहिक विवाह समारोह में खराब मौसम के बीच मुख्यमंत्री विष्णुदेव साय कार्यक्रम में पहुंचे थे। इसी दौरान विधानसभा अध्यक्ष डॉ. रमन सिंह ने मंच से ही जिला प्रशासन की कार्यप्रणाली पर कड़ी नाराजगी व्यक्त की। उन्होंने कहा कि मुख्यमंत्री के स्वागत, प्रोटोकॉल और व्यवस्थाओं में गंभीर चूक हुई है तथा अपने लंबे राजनीतिक जीवन में उन्होंने ऐसी अव्यवस्था पहले कभी नहीं देखी। कार्यक्रम के दौरान कलेक्टर प्रतिष्ठा महंगाई और पुलिस अधीक्षक रामकृष्ण साहू को सार्वजनिक रूप से फटकार भी लगाई गई।इस कार्यक्रम की एक और विशेषता यह रही कि बेमेतरा विधायक दीपेश साहू ने तरुणा साहू के साथ इसी सामूहिक विवाह समारोह में सात फेरे लिए। इसे प्रदेश की राजनीति में एक ऐतिहासिक घटना के रूप में भी देखा गया। लेकिन कार्यक्रम की व्यवस्थाओं को लेकर उठे विवाद ने इस उपलब्धि को भी पीछे छोड़ दिया।इन घटनाओं के बावजूद बेमेतरा जिले की तत्कालीन प्रशासनिक व्यवस्था में तत्काल किसी बड़े बदलाव की जानकारी सामने नहीं आई। इससे यह प्रश्न उठने लगा कि यदि सार्वजनिक मंच से प्रोटोकॉल में गंभीर चूक स्वीकार की गई थी और वरिष्ठ संवैधानिक पदाधिकारी ने स्वयं अधिकारियों को फटकार लगाई थी, तो उसके बाद जवाबदेही तय करने की दिशा में क्या कार्रवाई हुई?दूसरी ओर गौरेला-पेंड्रा-मरवाही जिले में तत्कालीन कलेक्टर डॉ. संतोष देवांगन का लगभग दो माह के भीतर स्थानांतरण कर दिया गया। उनके स्थानांतरण के कारणों को लेकर अलग-अलग चर्चाएं होती रहीं, लेकिन इस घटनाक्रम ने यह सवाल जरूर खड़ा कर दिया कि क्या प्रदेश में सभी जिलों के लिए प्रशासनिक जवाबदेही के समान मानदंड लागू हो रहे हैं?प्रशासनिक हलकों में यह चर्चा भी है कि यदि किसी जिले में सार्वजनिक रूप से प्रोटोकॉल की गंभीर चूक सामने आती है और शीर्ष नेतृत्व नाराजगी व्यक्त करता है, तो स्वाभाविक रूप से कठोर प्रशासनिक कार्रवाई की अपेक्षा की जाती है। वहीं दूसरी ओर, अन्य जिलों में अपेक्षाकृत कम विवादों के बीच अधिकारियों का शीघ्र स्थानांतरण कई तरह की आशंकाओं और सवालों को जन्म देता है।सुशासन का मूल आधार केवल कार्रवाई करना नहीं, बल्कि कार्रवाई में समानता और पारदर्शिता बनाए रखना भी है। यदि अलग-अलग परिस्थितियों में अलग-अलग मापदंड अपनाए जाते हैं, तो इससे प्रशासनिक व्यवस्था की निष्पक्षता पर प्रश्न उठना स्वाभाविक है। लोकतांत्रिक शासन व्यवस्था में यह आवश्यक है कि प्रत्येक अधिकारी के लिए जवाबदेही का एक समान पैमाना हो, चाहे वह किसी भी जिले में पदस्थ हो।प्रदेश के प्रशासनिक और राजनीतिक गलियारों में अब यह चर्चा तेज है कि अधिकारियों के स्थानांतरण और जवाबदेही तय करने की स्पष्ट एवं पारदर्शी नीति सामने आनी चाहिए। यदि किसी जिले में प्रोटोकॉल की चूक को गंभीर माना जाता है तो उसका परिणाम भी स्पष्ट होना चाहिए, और यदि किसी अन्य जिले में स्थानांतरण आवश्यक समझा जाता है तो उसके कारण भी सार्वजनिक रूप से स्पष्ट किए जाने चाहिए।यह मामला केवल दो जिलों या दो अधिकारियों का नहीं, बल्कि प्रशासनिक निष्पक्षता, जवाबदेही और सुशासन के उन सिद्धांतों का है जिन पर जनता का विश्वास टिका होता है। आने वाले समय में सरकार यदि स्थानांतरण और जवाबदेही के संबंध में एक समान एवं पारदर्शी नीति अपनाती है, तो इससे प्रशासनिक व्यवस्था पर जनता का विश्वास और अधिक मजबूत होगा।


