तरुण कौशिक/संपादक सर्वव्यापी/
छत्तीसगढ़ की राजनीति में एक समय प्रभावशाली भूमिका निभाने वाले वरिष्ठ भाजपा नेता रमेश बैस आज संगठन और सत्ता—दोनों से दूर होते जा रहे हैं। सात बार के सांसद और असम, झारखंड एवं महाराष्ट्र जैसे महत्वपूर्ण राज्यों के राज्यपाल रहे रमेश बैस, सेवानिवृत्ति के तुरंत बाद जब अपनी जन्मभूमि छत्तीसगढ़ लौटे और भाजपा की सक्रिय सदस्यता ग्रहण की, तब राजनीतिक हलकों में यह चर्चा जोरों पर थी कि वे एक बार फिर राज्य की राजनीति में निर्णायक भूमिका निभाएंगे।लेकिन बीते महीनों के घटनाक्रमों ने इस उम्मीद पर विराम लगा दिया है। भाजपा के वरिष्ठतम नेताओं में शुमार रमेश बैस को न तो संगठनात्मक मोर्चे पर कोई विशेष जिम्मेदारी दी गई है और न ही उन्हें राजनीतिक विमर्शों में तवज्जो मिल रही है। पार्टी कार्यक्रमों में भले ही उन्हें पूर्व राज्यपाल के रूप में प्रोटोकॉल के तहत सम्मान दिया जाता है, लेकिन राजनीतिक प्रभाव के स्तर पर उनकी स्थिति “साइडलाइन” मानी जा रही है।राजनीतिक गलियारों में अब यह चर्चा जोर पकड़ रही है कि आखिर क्यों भाजपा अपने इतने अनुभवी और सधे हुए नेता को उपेक्षित रख रही है। क्या यह पीढ़ीगत बदलाव की रणनीति है या फिर आंतरिक गुटबाजी का परिणाम यह सवाल अब भाजपा के भीतर और बाहर दोनों जगह गूंजने लगा है।सूत्र बताते हैं कि रमेश बैस खुद सक्रिय राजनीति से किनारा नहीं करना चाहते थे, बल्कि वे छत्तीसगढ़ की राजनीति में अपनी भूमिका को पुनः परिभाषित करने के इच्छुक थे। मगर पार्टी की प्राथमिकताएं इस समय कुछ और दिख रही हैं।राज्य की राजनीति पर गहरी पकड़ और संगठन संचालन की गहरी समझ रखने वाले बैस की यह “राजनीतिक चुप्पी” अब चर्चा का नया विषय बन चुकी है।क्या आने वाले दिनों में भाजपा उन्हें कोई बड़ी भूमिका देकर सक्रिय करेगी, या वे केवल औपचारिक सम्मान तक सीमित रह जाएंगे ,यही अब छत्तीसगढ़ की राजनीति का बड़ा सवाल है।


