तरुण कौशिक/संपादक सर्वव्यापी/
स्वामी आत्मानंद शासकीय उच्चतर माध्यमिक विद्यालय सेजेएस सरायपाली के प्राचार्य मनोज कुमार पटेल को पुनः उसी विद्यालय में पदस्थ करने के आदेश को लेकर एक बार फिर शिक्षा विभाग का “डाकघर तंत्र” सुर्खियों में है।अभिभावकों ने रायपुर संभाग आयुक्त महादेव कावरे को शिकायत प्रस्तुत कर मामले का निराकरण करने की मांग की थी। जिस पर कमिश्नर ने स्पष्ट रूप से जिला शिक्षा अधिकारी महासमुंद को निर्देश दिए थे कि शिकायत का निराकरण कर रिपोर्ट प्रस्तुत करें।लेकिन मामला जैसे शिक्षा विभाग के किसी “भूलभुलैया फाइल” में अटक गया हो। डीईओ महासमुंद का कहना है कि मुझे अभी तक इस संबंध में कोई दिशा-निर्देश प्राप्त नहीं हुआ है। संभव है कि कमिश्नर का आदेश कार्यालय के आवक-जावक शाखा में आया हो, पर मुझे प्राप्त नहीं हुआ। आदेश मिलते ही कलेक्टर को फाइल ‘फ्रूटअप’ करा देंगे।यानी कमिश्नर का आदेश यात्रा पर है— कब आया, कहाँ रुका और किस मेज़ पर विश्राम कर रहा है, इसकी जानकारी खुद डीईओ को भी नहीं है!इस बीच, अभिभावक सवाल उठा रहे हैं कि जब संभाग आयुक्त का आदेश ही जमीन पर नहीं उतर पा रहा, तो एक साधारण शिक्षक या अभिभावक की शिकायत का क्या हश्र होगा?सरकारी कार्यालयों में “डाकघर नीति” का यह ताज़ा उदाहरण फिर साबित करता है कि शिक्षा विभाग में फाइलें उड़ती नहीं, रेंगती हैं, और आदेशों की गति छत्तीसगढ़ी कहावत के मुताबिक हुकुम के चिट्ठी, बाबू के मर्जी ले चलथे।


