तरुण कौशिक/ संपादक सर्वव्यापी/
छत्तीसगढ़ में सरकारी शिक्षा व्यवस्था एक बार फिर सवालों के घेरे में है। स्कूल शिक्षा सचिव सिद्धार्थ कोमल सिंह परदेशी ने हाल ही में वीसी के माध्यम से सभी जिला शिक्षा अधिकारियों की बैठक लेकर शैक्षणिक गुणवत्ता सुधारने और अनुशासन बनाए रखने के सख्त निर्देश दिए। सचिव ने स्पष्ट कहा कि शिक्षा व्यवस्था में किसी भी प्रकार की लापरवाही या राजनीति बर्दाश्त नहीं की जाएगी।लेकिन जमीनी हकीकत इससे उलट है ,प्रदेश के कई सरकारी स्कूल अब शिक्षा का मंदिर नहीं, राजनीतिक अखाड़ा बन चुके हैं। शिक्षक समूहों में आपसी गुटबाज़ी और खिंचतान ने शैक्षणिक वातावरण को दूषित कर दिया है। शिक्षकों की यह अंदरूनी राजनीति सीधे तौर पर विद्यार्थियों के भविष्य को अंधकारमय बना रही है।ग्रामीण इलाकों के स्कूलों में तो हाल और भी चिंताजनक हैं। शिक्षण सत्र चल रहा है, लेकिन कक्षाओं में बच्चों से ज़्यादा राजनीति की बातें गूंज रही हैं। निरीक्षण में कई जगह पाया गया कि शिक्षक अपने दायित्वों से विमुख होकर राजनीतिक रस्साकशी में उलझे हुए हैं।शिक्षा सचिव ने एक बार फिर संकेत दिया है कि अगर हालात नहीं सुधरे, तो सख्त कार्रवाई तय है। लेकिन सवाल यह है कि जब शिक्षा ही राजनीति की भेंट चढ़ जाएगी, तो आने वाली पीढ़ी का भविष्य कौन बचाएगा?


