तरुण कौशिक/संपादक सर्वव्यापी/
छत्तीसगढ़ सरकार द्वारा स्कूलों के आसपास बढ़ते आवारा कुत्तों के आतंक को देखते हुए शिक्षकों को बच्चों की सुरक्षा सुनिश्चित करने संबंधी निर्देश जारी किए गए हैं, लेकिन इस निर्देश ने अब प्रशासनिक जिम्मेदारियों के बंटवारे को लेकर बड़ी बहस खड़ी कर दी है। कई जिलों में स्कूलों के पास कुत्तों की संख्या तेजी से बढ़ी है, जिसके चलते बच्चों का पीछा करने, डराने और काटने जैसी घटनाएं सामने आई हैं। अभिभावकों की लगातार शिकायतों के बाद शिक्षा विभाग ने शिक्षकों से कहा है कि वे स्कूल परिसर के बाहर कुत्तों की गतिविधियों पर नजर रखें, बच्चों को समूह में घर भेजें और सतर्कता बढ़ाएं, ताकि किसी भी तरह की दुर्घटना से बचा जा सके।लेकिन इस आदेश को लेकर शिक्षकों और विशेषज्ञों में नाराज़गी साफ दिख रही है। उनका कहना है कि पहले से ही शिक्षकों पर गैर-शैक्षणिक कार्यों का भारी बोझ है—जनगणना, सर्वेक्षण, मतदाता सूची आदि—और अब बच्चों को आवारा कुत्तों से बचाने का दायित्व भी उन्हीं पर डाल दिया गया है। शिक्षक संगठनों का आरोप है कि सरकार अपनी मूल जिम्मेदारियों को शैक्षणिक काम में लगे कर्मचारियों पर थोप रही है, जबकि वास्तविक जिम्मेदारी स्थानीय प्रशासन, नगरीय निकायों और पंचायतों की है। यह कदम इस बात का अप्रत्यक्ष स्वीकार है कि ये संस्थाएं कुत्तों के नियंत्रण में विफल रही हैं।नगरीय निकायों की जिम्मेदारी पहले से निर्धारित है। कुत्तों की नसबंदी, टीकाकरण, पकड़ने की कार्रवाई, कचरा प्रबंधन और डॉग स्क्वॉड संचालन नगर निगम, नगर पालिका और नगर पंचायतों के दायित्व में आते हैं। लेकिन कई क्षेत्रों में महीनों से कोई कार्रवाई नहीं हुई है। कचरा प्रबंधन की कमजोर व्यवस्था के चलते स्कूलों के आसपास कुत्तों की भीड़ जमा होती है। डॉग शेल्टरों की कमी और नसबंदी अभियान की सुस्ती भी बड़ी वजह मानी जा रही है। ऐसे में शिक्षकों को सुरक्षा का अतिरिक्त कार्य सौंपना निकायों की निष्क्रियता को उजागर करता है।इधर ग्रामीण क्षेत्रों की स्थिति और भी चिंताजनक है, क्योंकि वहां पंचायत स्तर पर पशु नियंत्रण व्यवस्था लगभग नाममात्र की है। ग्राम पंचायतों को कानूनन गांवों में स्वच्छता, पशु नियंत्रण और सार्वजनिक स्वास्थ्य व्यवस्था का दायित्व दिया गया है, लेकिन व्यवहार में न कचरा निस्तारण व्यवस्थित है, न कुत्तों की निगरानी होती है और न ही कोई नियमित अभियान चलता है। ग्रामीण स्कूलों में आवारा कुत्तों की संख्या अधिक बढ़ रही है और पंचायतों की उदासीनता के कारण गांव के बच्चे सबसे अधिक जोखिम में हैं। शिक्षकों का कहना है कि यदि पंचायतें अपनी जिम्मेदारी निभाएं तो स्कूलों में सुरक्षा का दबाव शिक्षकों पर नहीं आएगा।विशेषज्ञों का मानना है कि बच्चों की सुरक्षा सर्वोपरि है, लेकिन यह केवल शिक्षकों के भरोसे छोड़ देना समाधान नहीं हो सकता। इसके लिए एक संयुक्त और मजबूत प्रणाली की आवश्यकता है, जिसमें पंचायतें, नगरीय निकाय, जिला प्रशासन, पुलिस और शिक्षा विभाग मिलकर कार्रवाई करें। स्कूलों के आस-पास नियमित डॉग पेट्रोलिंग, नसबंदी-टीकाकरण अभियान को तेज़ करना, कचरा प्रबंधन सुधारना और आपात स्थिति में त्वरित प्रतिक्रिया की व्यवस्था बनाना अत्यंत आवश्यक है।स्पष्ट है कि सरकार का उद्देश्य बच्चों की सुरक्षा सुनिश्चित करना है, लेकिन जिम्मेदारी के असंतुलित वितरण को लेकर कई सवाल उठ रहे हैं। जब तक पंचायतों, नगरीय निकायों और प्रशासन का समन्वय मजबूत नहीं होगा, तब तक केवल शिक्षकों को आदेश जारी कर देने से समस्या का स्थायी समाधान संभव नहीं है। आवारा कुत्तों की बढ़ती संख्या एक गंभीर सार्वजनिक समस्या है और इसका समाधान एक व्यापक और जिम्मेदार तंत्र से ही निकल सकेगा।


