एकता का मंच बड़ा… लेकिन कुर्मी समाज उससे भी बड़ा — कुर्सियाँ कम पड़ गईं, समाज नहीं! - Sarvavyapi एकता का मंच बड़ा… लेकिन कुर्मी समाज उससे भी बड़ा — कुर्सियाँ कम पड़ गईं, समाज नहीं! - Sarvavyapi

एकता का मंच बड़ा… लेकिन कुर्मी समाज उससे भी बड़ा — कुर्सियाँ कम पड़ गईं, समाज नहीं!

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तरुण कौशिक/संपादक सर्वव्यापी/

छत्तीसगढ़ सर्व कुर्मी समाज, जिला बिलासपुर के दूसरे विराट अधिवेशन में इस बार एक अद्भुत नज़ारा देखने को मिला।एक मंच पर समाज को लाने की श्याम मूरत कौशिक की पहल तो सफल रही, पर मंच की चौड़ाई समाज की भीड़ देखकर खुद शर्मिंदा हो गई।आयोजकों का कहना है कि वे समाज को जोड़ने निकले थे, पर भीड़ देखकर लगा जैसे समाज खुद ही जुड़ने के लिए उतावला था।कार्यक्रम में उपस्थित वरिष्ठजन ने हल्के-फुल्के अंदाज़ में कहा कि कुर्मी समाज में इतनी संख्या दिख रही है कि अब गिनती मशीन भी सोच में पड़ गई है कि ‘भैया, ये जनगणना है या जन-बंधन?’अधिवेशन में श्याम मूरत कौशिक की सामाजिक एकता की पहल की जमकर सराहना हुई।लेकिन व्यंग्य यह भी कि भाषण देने वालों से ज्यादा लोग फोटो खिंचवाने की लाइन में थे, और मंच से ज्यादा मोबाइल कैमरों की चमक दिख रही थी।इसके बावजूद पूरा आयोजन कुर्मी समाज की मजबूत एकजुटता का प्रतीक बनकर सामने आया। समाज के युवा, महिलाएँ, वरिष्ठ सभी वर्गों ने जिस तरह सहभागिता दिखाई, उससे यह संदेश साफ गया कि कुर्मी समाज जब एक होता है तो अधिवेशन छोटा पड़ जाता है, इतिहास बड़ा बन जाता है।


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