तरुण कौशिक/ संपादक सर्वव्यापी/
छत्तीसगढ में एक ऐसा मामला सामने आया है जिसने समाज, कानून और प्रशासन—तीनों को गंभीर सोच में डाल दिया है। एक महिला ने जिस व्यक्ति के साथ लगभग 12 वर्षों तक सहमति से संबंध रखने के बाद अचानक “शादी का झांसा देकर दैहिक शोषण” का मामला दर्ज कराया, उसी महिला ने कुछ ही दिनों के भीतर उसी व्यक्ति के खिलाफ भरण–पोषण की याचिका भी प्रस्तुत कर दी। एक ही संबंध पर आधारित दो बिल्कुल विपरीत प्रकार की कार्यवाहियों—पहले बलात्कार का केस और फिर भरण–पोषण की मांग—ने पूरे प्रकरण को संदेहों और सवालों के घेरे में ला खड़ा किया है।महिला का दावा है कि वर्ष 2013 से 2025 तक वह संबंधित व्यक्ति के साथ रही और अब उसने आरोप लगाया है कि यह सब शादी का भ्रम देकर करवाया गया शोषण था। कानूनी विशेषज्ञों के अनुसार, इतने लंबे समय तक चले स्वैच्छिक संबंध को अचानक “लगातार बलात्कार” कहना न्यायिक और तार्किक दृष्टि से असंगत माना जाता है, क्योंकि सर्वोच्च न्यायालय के कई फैसले स्पष्ट कहते हैं कि वयस्कों के बीच वर्षों तक चला सहमति–आधारित संबंध बाद में अचानक बलात्कार का आधार नहीं बन सकता।लेकिन इस पूरे विवाद को और गंभीर बनाने वाली बात यह है कि महिला ने बलात्कार की एफआईआर के कुछ समय बाद ही पारिवारिक न्यायालय में उसी व्यक्ति से भरण–पोषण की मांग करते हुए याचिका दायर कर दी। कानूनी हलकों में यह सबसे बड़ा विरोधाभास माना जा रहा है, क्योंकि यदि एक महिला स्वयं को “बलात्कार पीड़िता” बताती है, तो उसी व्यक्ति से भरण–पोषण की मांग करना स्वयं उसके दावे को कमजोर करता है। यही कारण है कि अब यह प्रश्न उठ रहा है कि क्या यह मामला आपराधिक कानून के दुरुपयोग का उदाहरण है।भरण–पोषण याचिका में महिला ने संबंधित व्यक्ति की आय को लेकर कई बड़े दावे किए हैं—जैसे कि उसकी आय प्रतिमाह लाखों में है और उसके पास कई मकान–जमीन है। जबकि संबंधित व्यक्ति का कहना है कि उसकी वास्तविक आय मात्र दस हजार रुपये मासिक है और वह पत्नी, चार बच्चों, वृद्ध माता–पिता और दिवंगत भाई के परिवार का पालन–पोषण करता है। उसके अनुसार अधिकांश संपत्तियाँ उसके रिटायर्ड पिता की हैं और शहर का एक पुराना मकान वर्षों से कब्जे में है। इन विरोधाभासी दावों ने मामले की विश्वसनीयता को और कमजोर कर दिया है।पीड़ित युवक ने अपने आवेदन में यह भी बताया है कि वर्ष 2013 से अब तक वह महिला द्वारा धमकी, ब्लैकमेल और झूठे मामलों में फँसाने की चेतावनियों को लेकर पुलिस में कई शिकायतें दे चुका था, लेकिन कोई निष्पक्ष कार्रवाई नहीं हुई। उसने कहा कि अचानक दर्ज की गई एफआईआर और उसके तुरंत बाद दायर भरण–पोषण याचिका ने उसके पूरे परिवार को मानसिक, सामाजिक और आर्थिक संकट में डाल दिया है। परिवार भय और अपमान के कारण टूट चुका है और उसकी स्वयं की मानसिक स्थिति भी चरम दबाव में है।इन परिस्थितियों के बीच पीड़ित युवक ने पूरे प्रकरण को लेकर भारत की राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू, सर्वोच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत, छत्तीसगढ़ के राज्यपाल रमेन डेका और छत्तीसगढ़ उच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश रमेश सिन्हा को विस्तृत चिट्ठी भेजकर उचित कार्रवाई की मांग की है। युवक ने अपने पत्र में कहा है कि वह किसी प्रतिशोध की भावना से नहीं बल्कि न्याय और संवैधानिक संरक्षण की अंतिम उम्मीद लेकर यह याचना कर रहा है। उसने यह भी लिखा है कि यदि उसे न्याय नहीं मिलता, तो उसकी टूटी मानसिक स्थिति उसे सोचने पर विवश कर रही है कि उसके जीवन–संघर्ष का अंत ही कर दिया जाए—हालाँकि यह उसकी व्यथा का चरम है, न कि कोई असंवैधानिक मांग।पूरा मामला अब न्यायिक प्रणाली और समाज दोनों के लिए एक चेतावनी के रूप में सामने आया है। सवाल यह है कि क्या 12 वर्षों तक चले सहमति–आधारित संबंध को कभी भी “बलात्कार” बताकर किसी भी व्यक्ति को गंभीर आरोपों में फँसाया जा सकता है? और क्या ऐसा होने पर यह न सिर्फ़ परिवार व्यवस्था बल्कि न्यायिक व्यवस्था की विश्वसनीयता के लिए भी खतरा नहीं है? पीड़ित युवक द्वारा उच्च संवैधानिक पदों को लिखी गई चिट्ठी ने इस विवाद को और गंभीर बना दिया है, और अब देखना होगा कि संबंधित संस्थाएँ इस मामले पर क्या संज्ञान लेती हैं।


