तरुण कौशिक/संपादक सर्वव्यापी/
छत्तीसगढ़ सरकार ने हाल ही में सभी जिलों के कलेक्टरों को अपने-अपने जिले में नियमित प्रेस कॉन्फ्रेंस करने का स्पष्ट आदेश दिया है, ताकि सरकार की योजनाओं और कामकाज की सही जानकारी सीधे जनता तक पहुंचे। उद्देश्य था—सरकार और जनता के बीच संवाद मजबूत हो, पारदर्शिता बढ़े और विकास की वास्तविक तस्वीर सामने आए।लेकिन जमीनी हकीकत कुछ और ही कहानी बयां कर रही है। मंत्रालय में बैठे वरिष्ठ आईएएस अधिकारी लगातार फील्ड रिपोर्ट, नीतिगत कार्यवाही और प्रशासनिक सुधार जैसे महत्वपूर्ण कामों में गंभीरता से जुटे हैं। वे न सोशल मीडिया के पीछे भाग रहे हैं, न ही अपनी दिनचर्या को चमकाने के लिए रील्स का सहारा ले रहे हैं।दूसरी ओर, जिलों में हालात बिल्कुल उलट हैं। कई कलेक्टर और मंत्री हर निरीक्षण, हर दौरा और हर औपचारिक बैठक पर रील्स बनाकर सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म्स पर पोस्ट करने में इतने व्यस्त हैं कि जनता तक प्रशासनिक काम का गंभीर संदेश पहुंच ही नहीं पा रहा। सरकारी आदेशों के मुताबिक जनता से संवाद के लिए प्रेस कॉन्फ्रेंस जरूरी है, लेकिन जिलों में यह काम औपचारिकता बनकर रह गया है।स्थिति इतनी खराब हो चुकी है कि कई कलेक्टर खुद को लगभग मुख्यमंत्री की तरह पेश कर रहे हैं। वरिष्ठ सचिवों और विभागीय अधिकारियों के आदेशों की अनदेखी करना, फील्ड रिपोर्ट्स को टालना, और सोशल मीडिया को शासन का विकल्प समझ लेना प्रशासनिक अनुशासन पर बड़ा सवाल खड़ा करता है।सरकार का उद्देश्य था—जिले जनता की बात सीधे सुनें और अपनी योजनाओं की ईमानदार जानकारी दें। परंतु जिलों में अफसरों की प्राथमिकता “अच्छी प्रशासनिक कार्यशैली” नहीं, बल्कि “अच्छी रील” बनती जा रही है। रील्स लाखों व्यू ले लें, पर जनता का भरोसा नहीं जीत पा रही—यही सबसे बड़ा संकट है।जनता आज भी असंतुष्ट है, क्योंकि दिखावे से विकास नहीं होता। वरिष्ठ अधिकारियों की मेहनत जमीन पर तभी असर दिखाएगी जब जिलों में बैठे कलेक्टर आदेशों को समझेंगे, न कि ‘सोशल मीडिया प्रशासन’ चलाएंगे।सरकार को अब तय करना होगा—क्या प्रशासनिक कामकाज का चेहरा रील्स होंगी या वास्तविक जवाबदेही? क्योंकि जिलों में चल रही यह “रिल राजनीति” न सिर्फ शासन की गंभीरता पर सवाल उठाती है बल्कि मुख्यमंत्री की कार्यशैली को भी पीछे धकेल रही है।अंत में बड़ा सवाल:- क्या कलेक्टरों की फील्ड में ‘सोशल मीडिया छवि’ बनाना ज्यादा महत्वपूर्ण है, या जनता की समस्याएं सुनना? क्या जिलों में प्रशासन को अब भी यह समझ नहीं आया कि लोकतंत्र रील्स से नहीं, जवाबदेही से चलता है?


