भू-माफिया और अवैध खनन माफिया के लिए ‘खौफ का नाम’ बने पी. दयानंद- राजनीतिक दबावों से बेपरवाह, कानून के साथ खड़े अफसर।

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तरुण कौशिक/ संपादक सर्वव्यापी/

छत्तीसगढ़ की प्रशासनिक व्यवस्था में कुछ नाम ऐसे होते हैं, जिनका उल्लेख मात्र से ही अवैध गतिविधियों में लिप्त लोगों की धड़कनें तेज़ हो जाती हैं। मुख्यमंत्री के सचिव एवं खनिज विभाग के सचिव पी. दयानंद आज ऐसे ही अफसर के रूप में स्थापित हो चुके हैं, जिनका नाम सुनते ही भू-माफिया और अवैध खनिज खनन करने वालों में थर-थराहट देखी जाती है।पी. दयानंद उस दौर में व्यापक चर्चा में आए थे, जब वे कोरबा कलेक्टर के रूप में पदस्थ थे। उस समय कांग्रेस के वरिष्ठ नेता जय सिंह अग्रवाल द्वारा उनके खिलाफ खुला मोर्चा खोला गया था। राजनीतिक गलियारों में यह माना जा रहा था कि दबाव के आगे प्रशासनिक सख्ती कमजोर पड़ जाएगी, लेकिन ऐसा नहीं हुआ। दयानंद ने न तो अपने कदम पीछे खींचे और न ही कानून के दायरे से बाहर जाकर कोई समझौता किया।विडंबना यह रही कि बाद में जब जय सिंह अग्रवाल स्वयं मंत्री बने, तब भी वे पी. दयानंद के खिलाफ कोई ठोस कार्रवाई नहीं कर सके। यह तथ्य अपने-आप में इस बात का प्रमाण है कि पी. दयानंद की कार्यप्रणाली पूरी तरह नियम, कानून और प्रशासनिक मर्यादाओं पर आधारित रही है।आज स्थिति यह है कि पी. दयानंद मुख्यमंत्री विष्णु देव साय के सचिव होने के साथ-साथ खनिज विभाग के सचिव की महत्वपूर्ण जिम्मेदारी भी संभाल रहे हैं। यह पद स्वयं में बेहद संवेदनशील माना जाता है, क्योंकि यहीं से भू-माफिया और अवैध खनन माफिया की सबसे बड़ी जड़ें जुड़ी होती हैं। इसके बावजूद दयानंद बिना किसी राजनीतिक दबाव की परवाह किए लगातार सख्त कार्रवाई कर रहे हैं।सूत्रों की मानें तो अवैध खनन, रेत माफिया और जमीन हड़पने वाले गिरोहों के खिलाफ चल रही कार्रवाइयों से माफिया खेमे में बेचैनी साफ देखी जा सकती है। फाइलों की गति तेज़ है, कार्रवाई ज़मीनी स्तर पर दिखाई दे रही है और यह संदेश स्पष्ट है कि कानून से ऊपर कोई नहीं।पी. दयानंद की कार्यशैली यही बताती है कि प्रशासन अगर ठान ले तो राजनीतिक शोर-शराबे और दबावों के बावजूद व्यवस्था को दुरुस्त किया जा सकता है। यही कारण है कि आज उनका नाम ईमानदार, निर्भीक और कर्तव्यनिष्ठ अफसरों की सूची में सम्मान के साथ लिया जाता है।छत्तीसगढ़ की जनता और व्यवस्था के लिए यह संकेत है कि सत्ता के शीर्ष पर बैठे कुछ अफसर अब भी ऐसे हैं, जो कुर्सी नहीं,संविधान और कानून को प्राथमिकता देते हैं।


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