दबाव, भय और अनदेखी के बीच टूटते शैक्षिक समन्वयक, पदमुक्ति की मांग बनी मजबूरी।

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तरुण कौशिक/संपादक सर्वव्यापी/

बिलासपुर जिले के बिल्हा विकासखंड में पदस्थ शैक्षिक समन्वयकों का संकट अब खुलकर सामने आ गया है। शिक्षा व्यवस्था की रीढ़ माने जाने वाले ये समन्वयक आज स्वयं असुरक्षा, मानसिक तनाव और प्रशासनिक उपेक्षा के शिकार हो चुके हैं। हालात ऐसे बन गए हैं कि 8 से 9 शैक्षिक समन्वयकों ने व्यक्तिगत, पारिवारिक एवं गंभीर स्वास्थ्य कारणों का हवाला देते हुए उच्च कार्यालय में पदमुक्ति के लिए आवेदन प्रस्तुत कर दिया है, लेकिन अब तक उनके आवेदनों पर कोई ठोस निर्णय नहीं लिया गया है।शैक्षिक समन्वयकों का कहना है कि लगातार बढ़ते दबाव और अनिश्चितता ने उनके कार्य वातावरण को भयावह बना दिया है। बिना किसी स्पष्ट कारण के निलंबन की आशंका दिखाई जाती है, जिससे वे हर समय मानसिक तनाव में रहते हैं। कुछ तथाकथित लोग पत्रकारिता की आड़ में आरटीआई का उपयोग कर उन पर दबाव बनाते हैं, जिससे वे स्वयं को प्रताड़ित महसूस कर रहे हैं।समन्वयकों का आरोप है कि उनसे समग्र शिक्षा से जुड़े कार्यों के अलावा जाति प्रमाण पत्र बनवाने, व्यक्तिगत कार्य कराने और अन्य विभागों के डाक आदान-प्रदान व प्रशासनिक पत्राचार जैसे गैर-शैक्षणिक कार्य भी कराए जा रहे हैं। यह न केवल उनके दायित्व क्षेत्र से बाहर है, बल्कि उनके मूल शैक्षणिक उद्देश्यों को भी प्रभावित कर रहा है।लगातार अतिरिक्त कार्यभार का असर शैक्षिक समन्वयकों के पारिवारिक और व्यक्तिगत जीवन पर साफ दिखाई देने लगा है। न वे परिवार को समय दे पा रहे हैं और न ही अपने स्वास्थ्य पर ध्यान। लगातार तनाव के कारण कई समन्वयकों की तबीयत बिगड़ चुकी है, जिससे शिक्षा व्यवस्था की मानवीय संवेदनशीलता पर सवाल खड़े हो रहे हैं।स्थिति की गंभीरता इस तथ्य से भी उजागर होती है कि पूर्व में इसी तरह के दबाव में संकुल दयालबंद के एक शैक्षिक समन्वयक की अकाल मृत्यु हो चुकी है। वहीं दयालबंद के ही एक अन्य समन्वयक को उच्च रक्तचाप के चलते लकवा हो गया। गंभीर बीमारी के बावजूद वे अपने पिता के सहयोग से कार्य करने को विवश हैं, जो पूरे सिस्टम की अमानवीय तस्वीर पेश करता है।यह समस्या केवल बिल्हा विकासखंड तक सीमित नहीं है। चांटीडीह, मोपका, एमएलबी, बालक सरकंडा, कुदुदंड, तारबहार, कोनी, बिरकोना, बिजनौर और सिरगिट्टी जैसे क्षेत्रों में भी शैक्षिक समन्वयकों पर बढ़ते दबाव का प्रभाव साफ देखा जा रहा है। इसका सीधा असर विद्यालयों की शैक्षणिक गुणवत्ता और प्रशासनिक संतुलन पर पड़ रहा है।शिक्षा विभाग के सूत्रों का मानना है कि यदि इस गंभीर स्थिति को समय रहते नहीं संभाला गया, तो इसका खामियाजा पूरे शिक्षा तंत्र को भुगतना पड़ सकता है। शैक्षिक समन्वयकों ने मांग की है कि उनके पदमुक्ति आवेदनों पर सहानुभूतिपूर्वक विचार किया जाए, गैर-शैक्षणिक कार्य तत्काल वापस लिए जाएं तथा आरटीआई और निलंबन के नाम पर हो रहे भयादोहन की निष्पक्ष जांच कराई जाए।समन्वयकों का स्पष्ट कहना है कि कार्यभार का युक्तियुक्त पुनर्गठन किया जाए और उनके स्वास्थ्य एवं मानसिक सुरक्षा को प्राथमिकता दी जाए, ताकि शिक्षा व्यवस्था को बचाया जा सके। अन्यथा यह संकट आने वाले समय में और भी गहराता चला जाएगा।


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