तरुण कौशिक/ संपादक सर्वव्यापी/
उत्तर प्रदेश हिंदी संस्थान, लखनऊ तथा महात्मा गांधी अंतरराष्ट्रीय हिंदी विश्वविद्यालय वर्धा महाराष्ट्र के संयुक्त तत्वावधान में वर्धा में आयोजित त्रिदिवसीय अंतरराष्ट्रीय संगोष्ठी के अंतर्गत शनिवार को ग़ालिब सभागार में “वैश्विक परिप्रेक्ष्य में हिंदी” विषय पर विद्वानों ने विस्तार से विचार साझा किए। सत्र की अध्यक्षता काशी हिंदू विश्वविद्यालय, वाराणसी के वरिष्ठ प्राध्यापक प्रो. आनंद वर्धन शर्मा ने की।अपने अध्यक्षीय संबोधन में प्रो. शर्मा ने कहा कि तकनीक ने हिंदी के वैश्विक विस्तार को नई गति दी है। आज यह समझना आवश्यक है कि हिंदी का विश्व की किन-किन भाषाओं में अनुवाद हुआ है और किस प्रकार वह अंतरराष्ट्रीय संवाद की सशक्त भाषा बन रही है। उन्होंने कहा कि भारत की राष्ट्रीय भाषा के रूप में हिंदी की भूमिका को और सुदृढ़ करने के लिए इसके प्रचार-प्रसार के सतत प्रयास जरूरी हैं। वर्तमान में भारत के अनेक विद्वान विदेशों में हिंदी का अध्यापन कर रहे हैं और आज 150 से अधिक देशों में हिंदी का अध्ययन किया जा रहा है।उन्होंने बताया कि प्राचीन ग्रंथों से लेकर आधुनिक साहित्य तक हिंदी रचनाओं का अन्य भाषाओं में अनुवाद हो रहा है, जिससे हिंदी का वैश्विक स्वरूप और अधिक मजबूत हुआ है। साथ ही विश्व के अनेक देशों में आयोजित भारतीय बाज़ार, उत्सव और सांस्कृतिक कार्यक्रम हिंदी के प्रसार का प्रभावी माध्यम बन रहे हैं। मनोरंजन के साधनों को भी अब अकादमिक अध्ययनों में शामिल किया जा रहा है। सत्यम दास के विचारों का उल्लेख करते हुए उन्होंने कहा कि हिंदी छोटे से छोटे देश में भी एक सक्षम और जीवंत भाषा है। आज बड़ी संख्या में विदेशी विद्यार्थी भारत आकर हिंदी का अध्ययन कर रहे हैं।मुख्य अतिथि के रूप में जापान के वासेदा विश्वविद्यालय से आए प्रो. हितओआकि ईशिदा ने भारत–जापान संबंधों की ऐतिहासिक पृष्ठभूमि पर प्रकाश डाला। उन्होंने कहा कि दोनों देशों के सांस्कृतिक संबंध छठी शताब्दी में बौद्ध धर्म के प्रसार से प्रारंभ हुए। जापान में हिंदू देवी-देवताओं का सांस्कृतिक प्रभाव आज भी देखा जा सकता है। उन्होंने तंजिको तोकोबे की कथाओं, जमशेदजी टाटा के जापान आगमन और व्यापारिक संबंधों का उल्लेख करते हुए बताया कि 1888 में जापान में विदेशी भाषा स्कूल तथा 1908 में हिंदुस्तानी भाषा विभाग की स्थापना हुई। टोक्यो और ओसाका आज हिंदी शिक्षण के प्रमुख केंद्र हैं, जहाँ प्रतिवर्ष 150 से 200 विद्यार्थी हिंदी सीखते हैं।सारस्वत अतिथि डॉ. इंदिरा गाजियावा (रशियन स्टेट यूनिवर्सिटी फॉर द ह्यूमैनिटीज, मॉस्को) ने कहा कि रूस में हिंदी का भविष्य उज्ज्वल है। उनके विश्वविद्यालय में हिंदी शिक्षण को प्रोत्साहित करने के लिए पाठ्यक्रम में अनिवार्य गद्य को शामिल किया गया है।बेल्जियम से जुड़े रो देबावेये (पूर्व विदेशी विद्यार्थी, महात्मा गांधी अंतरराष्ट्रीय हिंदी विश्वविद्यालय) ने हिंदी साहित्य के वैश्विक महत्व पर प्रकाश डाला। वहीं फ्रांस से डॉ. निकोला बुआँ मैंसीपातो ने कहा कि हिंदी एक समृद्ध सांस्कृतिक खजाना है और केवल अंग्रेज़ी पर निर्भर रहना दुर्भाग्यपूर्ण है। चीन के वुहान विश्वविद्यालय से श्री छू सलाउ ने भी हिंदी के अंतरराष्ट्रीय महत्व पर अपने विचार व्यक्त किए।सत्र का संचालन गांधी एवं शांति अध्ययन विभाग के अध्यक्ष डॉ. राकेश कुमार मिश्र ने किया, जबकि मराठी विभाग के सहायक प्राध्यापक डॉ. संदीप मधुकर सपकाले ने आभार ज्ञापन किया। इस अवसर पर विभिन्न विभागों के अध्यक्ष, शोधार्थी और बड़ी संख्या में विद्यार्थी उपस्थित रहे।